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फिर शान से दमकेगा कालिच खान का मकबरा

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कलीचाबाद मोहल्ले में नदी के किनारे बना कालिच खान का जर्जर हो चुका मक़बरा। - फोटो : JAUNPUR
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जौनपुर। शहर से कुछ दूर कलीचाबाद के पास गोमती तट पर स्थित ऐतिहासिक इमारत कालिच खान के मकबरे के दिन अब बहुरने वाले हैं। पुरातत्व विभाग ने मुगलकालीन इस ऐतिहासिक इमारत को संरक्षित करने का काम शुरू कर दिया है। पहले चरण में मकबरे के सभी पिलर की मरम्मत हूबहू मूल आकार में ही कराई गई है। अब मकबरे की छत, गुंबद और बाउंड्रीवाल के साथ पहुंच मार्ग के निर्माण का भी प्रस्ताव है। खास बात यह कि मरम्मत के दौरान सिर्फ सुर्खी-चूने का ही इस्तेमाल होगा, ताकि इसके स्वरूप में कोई बदलाव न आए। इसे आगामी वित्तीय वर्ष में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। शहर के इतिहास को समेटने वाली इस इमारत का जीर्णोद्धार कराकर इसे पर्यटन के लिए विकसित करने की तैयारी चल रही है।
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कालिच खान का मकबरा बारादरी के नाम से भी मशहूर है। मकबरे की नक्काशी और वास्तु शैली मुगलकाल की है। इस मकबरे की बनावट काफी हद तक आगरा के ताजमहल से मेल खाती है। शहर के ऐतिहासिक स्थलों के जानकार माजिद खान कहते हैं कि बादशाह अकबर ने अपनी फौज की ताकत बढ़ाने के लिए ईरान, इराक, सीरिया जैसे इलाकों से तमाम बहादुरों को ले आए थे। कालिच खान भी उन्हीं में से एक थे। उनके इंतकाल के बाद यहीं पर उनका मकबरा बनाया गया। कालिच खान के नाम पर ही कलीचाबाद बसा था।
अब मकबरे के गुंबद जर्जर हाल में हैं। मोटी-मोटी दरारें पड़ गई हैं। इससे बारिश में पानी अंदर तक आता है। इससे छत और दीवारें भी कमजोर हो रही हैं। गुंबद पर घास उग आई है। लखौरिया ईंट से बनी दीवारें भी जर्जर हो गई हैं। वही कालिच खान के मकबरे के आसपास की जमीन को लोगों ने अतिक्रमण कर रखा है। अभी दो महीने पहले पुरातत्व विभाग की पहल पर एसडीएम ने पैमाइश कराकर पत्थर गड़वा दिए थे। कुछ दिनों बाद ही अराजकतत्वों ने कई पत्थर उखाड़कर फेंक दिए। वीरान में होने के कारण यह इमारत नशाखोरों का अड्ढा बनकर रह गई है।
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कालिच खान के मकबरे का जीर्णोद्धार का काम शुरू किया गया है। अब अगले वित्तीय वर्ष में बाउंड्री, मकबरे की छत और गुंबद की मरम्मत कराई चूंकि मरम्मत के काम में सुर्खी, चूना और बालू का ही इस्तेमाल होता है इससे काम पूरा होने में वक्त लगेगा।
-जे. राजू, कनिष्ठ संरक्षक सहायक पुरातत्व विभाग।
शाहजहां के समय कालिच खान के हाथों में रही जौनपुर की कमान
कालिच खान अकबर बादशाह के समय से सूरत के किले के किलेदार थे, जिन्हें शाहजहां के समय जौनपुर का शासक बनाकर भेजा गया।
इस मकबरे का इतिहास ताजमहल से पहले का है। इस इमारत और ताजमहल में बहुत बातें एक जैैसी हैं। अपने शासनकाल के दौरान ही कालिच खान ने कलीचाबाद के पास गोमती के किनारे बारादरी का निर्माण कराया था। इतिहास के जानकार सैय्यद मासूम रजा बताते हैं कि इस इमारत में 12 दरवाजे हैं और पांच कब्रें हैं। इनमें कालिच खान, उनके दो बेटे और दो रिश्तेदारों की कब्र हैं। 1628-35 के बीच बनी इस ऐतिहासिक इमारत की देखभाल पुरातत्व विभाग करता है। वर्ष 2015 में जौनपुर दौरे पर आए पुरातत्व विभाग के तत्कालीन निदेशक सय्यद जमाल हसन ने इस बारादरी की दुर्दशा पर चिंता जताते हुए अपने विभाग के महानिदेशक को पत्र लिखा था। अब जाकर जीर्ण शीर्ण इस इमारत की मरम्मत का काम शुरू कराया गया है।
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आगरा के ताज और बारादरी में यह है समानता
सैय्यद मासूम रजा कहते हैं कि आगरा के ताजमहल और जौनपुर की बारादरी में कई समानताएं हैं। ताजमहल के गुंबद, उसके अंदर की नक्काशी और गुंबद के नीचे बनी कब्रिस्तान में काफी समानता देखने को मिलती है। इसके अलावा जिस तरह गोमती के तट पर बारादरी का निर्माण हुआ है उसी तरह आगरा का ताजमहल भी यमुना नदी के तट पर स्थित है। दोनों ही इमारतें समकालीन हैं, इसलिए भी दोनों के निर्माण में वैसी ही कला व नक्काशी की झलक दिखती है। इस इमारत की मरम्मत कराकर ठीक से देखभाल की जाए और यहां तक पहुंच मार्ग व सुरक्षा के इंतजाम किए जाएं तो यहां पर्यटन की काफी संभावनाएं हैं।

कलीचाबाद मोहल्ले में नदी के किनारे बना कालिच खान का जर्जर हो चुका मक़बरा।- फोटो : JAUNPUR

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