जौनपुर। धान की कटाई के बाद अवशेष (पराली) का निस्तारण किसानों के लिए आफत बन गया है। प्रदूषण के खतरे को देखते हुए सरकार ने पराली जलाने पर प्रतिबंध लगाया है। किसानों की मुश्किल रबी की बुवाई के पहले पराली को नष्ट करना जरूरी है। ऐस में न चाहते हुए भी किसान पराली जला रहे हैं और जुर्माना भर रहे हैं। मगर अब महज 20 रुपये की डिबिया पराली की समस्या से निजात दिला सकती है। इसके इस्तेमाल से खेतों की उर्वरा शक्ति भी बढ़ती है। कृषि विभाग भी इसके इस्तेमाल को प्रोत्साहित कर रहा है।
कृषि विभाग ने इसके समाधान के रूप में बायो डिकंपोजर पेश किया है। इसकी एक डिबिया से एक एकड़ खेत की पराली को खाद में तब्दील किया जा सकता है। 200 लीटर पानी में दो से तीन किलोग्राम गुड़ घोलकर उसमें 20 ग्राम की एक डिबिया डिकंपोजर को खेत में छिड़का जा सकता है। उप कृषि निदेशक जयप्रकाश बताते हैं कि घोलकर ढककर दो-तीन दिनों तक रखने के बाद इस्तेमाल करना चाहिए। इस घोलकर बीच-बीच में लकड़ी के डंडे से चलाते रहना पड़ता है। चौथे-पांचवें दिन इस घोल की सतह पर सफेद रुई की तरह फंफूद दिखने लगती है। छठवें दिन में फफूंद नीले, हरे या भूरे रंग की हो जाती है। सातवें दिन इसको अच्छी तरह से मिलाकर खेत में सिंचाई से पहले या सिंचाई के दौरान डाल देना चाहिए। इसके कुछ दिनों बाद फसल के अवशेष का रंग काला या भूरा हो जाता है। यह कार्बनिक खाद की प्रक्रिया है। इस विधि से गोबर की कंपोस्ट खाद भी तैयार की जा सकती है। उप कृषि निदेशक के मुताबिक जिला कृषि कार्यालय में डिकंपोजर उपलब्ध है। किसान इसे नजदीकी इफको केंद्र से भी प्राप्त कर सकते हैं।
यह होंगे लाभ
कृषि अवशेषों को सूक्ष्म जीवों के इस्तेमाल से खाद में बदला जा सकता है। इससे मिट्टी की संरचना बेहतर होती है। उर्वरा शक्ति में वृद्धि होती है और मिट्टी से उत्पन्न होने वाले नुकसानदायक सूक्ष्म जीवों से फसलों की सुरक्षा भी होती है। इसके उलट पराली जलाने से मिट्टी के लाभकारी सूक्ष्म जीव नष्ट हो जाते हैं और उर्वरा शक्ति प्रभावित होती है।