नौकरी है न रोजगार का ठौर, इस उम्र अब जाएं किस ओर
- किसी को सता रही बेटी की शादी की चिंता तो कोई कर्ज की भरपाई के लिए परेशान
- झूला फैक्ट्री के कर्मचारियों की बर्खास्तगी के बाद गहराया संकट
संवाद न्यूज एजेंसी
केराकत। जिस फैक्ट्री को चलाने और उसे आगे बढ़ाने में कर्मचारियों ने अपनी जवानी खपा दी, अब उसके बंद और सामूहिक बर्खास्तगी के बाद कर्मचारियों के सामने गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है। नाऊपुर स्थित झूला फैक्ट्री के कर्मचारी गहरे सदमे में हैं। किसी को कर्ज चुकाने की चिंता सताने लगी है तो कोई कुछ महीनों बाद होने वाली बिटिया के शादी को लेकर सशंकित है। नौकरी जाने और रोजगार का कोई अन्य ठौर न होने से वह अवसाद में डूबते जा रहे हैं।
नाऊपुर स्थित झूला फैक्ट्री में करीब साढ़े तीन सौ स्थाई कर्मचारी कार्यरत थे। इसके अलावा करीब डेढ़ गुनी संख्या दैनिक कर्मचारियों की थी, जो फैक्ट्री में काम कर अपना जीविकोपार्जन करते थे। तीन वर्ष पहले फैक्ट्री बंद होने के बाद भी स्थाई कर्मचारियों को बैंक के माध्यम से भुगतान होता रहा, जिससे उन्हें उम्मीद थी कि फिर से फैक्ट्री चालू होगी। उनके दिन बहुरेंगे, मगर अब अचानक से बर्खास्तगी की कार्रवाई ने सारी उम्मीदें तोड़ दी हैं। केराकत के ग्राम सोहनी थानागद्दी निवासी राजेश कुमार मौर्य फैक्ट्री में माली का काम करते थे। इसी वेतन से अपनी बूढ़ी मां, विधवा बहन का खर्च चलाते थे। लड़की की शादी भी करनी है, मगर अब नौकरी चले जाने से पूरे परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा है। परिजन काफी परेशान हो उठे हैं। थानागद्दी निवासी रमेश प्रजापति फैक्ट्री में चपरासी का काम करते थे। दिसंबर में बेटी की शादी है। पूरा परिवार इसी आमदनी पर आश्रित है। वाराणसी के गड़खरा निवासी सुनील उपाध्याय इस फैक्ट्री में कर्मचारी थे। पिछले वर्ष ही उन्होंने कर्ज लेकर बेटी की शादी की थी। मन में आस थी कि फैक्ट्री चलेगी तो कर्ज की पूर्ति हो जाएगी। अब नौकरी जाने के बाद समझ नहीं पा रहे कि कर्ज की अदायगी कैसे होगी। कैसे परिवार का भरण-पोषण होगा। गड़खरा के ही उमेश सिंह सुपरवाइजर थे। बीस लोगों का संयुक्त परिवार का भरण-पोषण उनके ऊपर है। बूढ़े माता-पिता की दवा आदि भी इसी नौकरी से हो रही थी। अब दो जून की रोटी जुटाने का संकट खड़ा हो गया है। कर्मचारियों का कहना है कि उम्र के इस पड़ाव में अन्यत्र नौकरी भी मिलना मुश्किल है। रोजगार का कोई अन्य विकल्प भी नहीं है। ऐसे में सरकार ही एकमात्र उम्मीद बची है।