मछलीशहर। शास्त्रों के अनुसार आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन भगवान श्री हरि विष्णु शयन करने के लिए बलि के द्वार पर पाताल लोक को जाते हैं। श्री हरि विष्णु चार मास तक विश्राम करते हैं और कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की देवोत्थान एकादशी के दिन उठते हैं।
इन चार मास को चातुर्मास कहते हैं। इस दौरान विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश जैसे शुभ एवं मांगलिक कार्य नहीं होते है। आषाढ़ मास शुक्ल पक्ष की एकादशी को भगवान श्री हरि विष्णु शयन करते हैं इसलिए इसे हरिशयनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस वर्ष हरिशयनी एकादशी व्रत पर्व का सुखद संयोग 6 जुलाई दिन रविवार को है। ज्योतिष एवं तंत्र आचार्य डॉ शैलेश मोदनवाल बताते हैं कि सृष्टि के पालनहार श्री हरि विष्णु इस दिन शयन के लिए जाते हैं इसलिए इस एकादशी व्रत के विशेष फल मिलते हैं। मान्यता है कि जो भी मनुष्य हरिशयनी एकादशी व्रत को करता है उसके सभी संकट दूर होते हैं तथा सभी मनोकामनाओं की पूर्ति के साथ ही सुख समृद्धि एवं धन धन धान्यादि की प्राप्ति होती है। पद्मपुराण के अनुसार सतयुग में उत्पन्न हुए सूर्यवंशी राजा मांधाता ने इस एकादशी व्रत का पालन राज्य के प्रजा की सुख समृद्धि के लिए तथा अनावृष्टि से उत्पन्न अकाल से मुक्ति पाने के लिए किया था। इस दिन भगवान विष्णु की प्रतिमा अथवा शालिग्राम शिला को पंचामृत से स्नान कराएं। कमल के पुष्पों तुलसी पत्र मंजरियों एवं धूप दीपादि से अर्चन करें। व्रत रहकर रात्रि जागरण कर हरि नाम संकीर्तन करें। विष्णुसहस्त्र नाम, पुरुष सूक्त, नारायण कवच का पाठ करना तथा ओम नमो नारायणाय मंत्र का जाप करना विशेष फलदाई है। इस तरह पूजन अर्चन करने वाला मनुष्य निश्चय ही महान पुण्य को अर्जित करता है। यह व्रत सब पापों को हरने वाली स्वर्ग एवं मोक्ष को देने वाली है।