फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

बेबसी का हाल मत पूछो, जिंदा हैं, यही क्या कम है...

विज्ञापन
विज्ञापन
मुंगराबादशाहपुर (जौनपुर)। आग लगे ऐसी नौकरी को, इससे अच्छा तो घर की मजदूरी ही है। जहां नौकरी करते थे, वहां पगार बंद हो गई। घर जाने के सिवाय चारा क्या रह गया था। बस घर सही सलामत घर पहुंच जाएं, यही बहुत है। अब नौकरी के लिए इतनी दूर नहीं जाना। कुछ ऐसे ही अल्फाज थे उन मजदूरों के जो हैदराबाद से पैदल ही सफर कर गोरखपुर की ओर जा रहे थे।
विज्ञापन

शुक्रवार को जौनपुर पहुंचे करीब 22 की संख्या में यह मजदूर थककर चूर थे। पैरों में बड़े-बड़े छाले पड़ चुके थे। चेहरे पर एक हजार किमी की यात्रा के थकान का दर्द साफ झलक रहा था। कंधे पर बैग और सिर पर झोला लिए पैदल ही आगे बढ़ रहे मजदूरों से उनके हाल के बारे में पूछा गया तो तमतमा उठे। भूख-प्यास ने उन्हें कातर कर दिया था। बोले, इतनी दुश्वारियों के बाद जिंदा हैं, यही क्या कम है। अब तो बस एक ही आस है कि जैसे-तैसे बस घर पहुंच जाएं। गोरखपुर निवासी आदर्श, सचिन, कामता, नंदलाल, पिंटू, बृजेश, लालता, धनंजय, रिशू, पुनीत, देवेश, प्रभात, अंकुर, नीरज, वैभव, योगेश, मिश्रीलाल आदि हैदराबाद में नील बनाने वाली फैक्ट्री में काम करते थे। लॉक डाउन के पहले काम की रफ्तार तेज थी तो सब कुछ बेहतर चलता रहा। लॉक डाउन के बाद कंपनी का कामकाज ठप पड़ा तो मालिक ने भी पगार रोक दी। गिड़गिड़ाते रहे, लेकिन एक न सुनी गई। पास में कुछ पैसे थे, जिससे पेट भरता रहा। जब भूखा मरने की नौबत आने लगी तो जान बचाने के लिए घर की रवानगी ही एकमात्र रास्ता बचा। कुछ जरुरी सामान लेकर पैदल ही घर ही ओर निकल पड़े हैं। पहुंच पाएंगे या नहीं, यह भरोसा नहीं है। मजदूरों ने बताया कि कुछ दूर तक ट्रकों का सहारा मिला, मगर ज्यादातर दूरी पैदल ही तय करनी पड़ी है। रास्ते भर लोग पूछ रहे कि कहां से आ रहे है और कहां जा रहा है... लेकिन किसी ने रोटी के लिए नहीं पूछा। किसी तरह से प्रयागराज फिर मुंगराबादशाहपुर पहुंचे हैं। अब चलने की हिम्मत नहीं, मगर कोई सहारा भी नहीं है। घर के लोग महीनों से परेशान हैं। बस हम लोग किसी तरह से घर पहुंच जाएं तो हमारी और परिवारवालों की ईद और दीवाली एक साथ हो जाए।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें