28 जुलाई 2005 की काली शाम की यादें आज भी लोगों के जेहन में ताजा हैं। श्रमजीवी एक्सप्रेस ट्रेन विस्फोट कांड का नाम जुबान पर आते ही उन परिवारों के लोग सिहर उठते हैं जो इस घटना के शिकार हुए। शरीर में आए जख्मों का असर तो आज तक है ही सरकारी मदद की आस भी पूरी न हो सकी।
मदद के लिए विवेचना का हवाला दिए जाने की टीस उनके मन को चुभ रही है। विस्फोट कांड की 11वीं बरसी के एक दिन बाद 29 जुलाई को इस मामले में फैसला आने वाला है। ऐसे में उन परिवारों के लोगों के अलावा आवाम को भी कोर्ट के फैसले का बेसब्री से इंतजार है।
बता दें कि पटना से दिल्ली जा रही श्रमजीवी एक्सप्रेस की सामान्य बोगी में जिले के हरपालगंज स्टेशन के पास 28 जुलाई 2005 की शाम करीब सवा पांच बजे हुए विस्फोट में दर्जनों लोग शिकार हुए थे। उस घटना में 12 की मौत हो गई थी और 18 से अधिक जख्मी हो गए थे।
उस मंजर को याद कर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। शहर के कोतवाली निवासी विश्वनाथ सेठ, ओलंदगंज निवासी मदन लाल सेठ और शेखपुरा निवासी गोरख नाथ निषाद 28 जुलाई को श्रमजीवी एक्सप्रेस की उस जनरल बोगी में सवार थे जिसमें विस्फोट हुआ। सभी के शरीर में गहरे जख्म आए ।
विश्वनाथ सेठ का एक पैर खराब हो गया तो गोरख नाथ निषाद की कमर की हड्डी में गहरा जख्म आया था। गोरखनाथ के परिवार के लोगों का कहना है कि घटना के बाद एक बार नाममात्र की सहायता राशि मिली। और मदद के नाम पर आश्वासन के अलावा कुछ नहीं मिला।