अंधाधुंध रासायनिक खादों के इस्तेमाल से ऊसर हो रही मिट्टी की सेहत को अब नीम ही बचाएगी, लेकिन दुर्भाग्य यह कि देश में इसके पेड़ जरूरत के 20 फीसदी ही उपलब्ध हैं।
अब देश के किसानों को नीम से बनी यूरिया और अन्य कीटनाशकों की आपूर्ति के लिए अधिक उत्पादकता वाली नीम की प्रजाति की खोज शुरू हो गई है। इसके लिए देहरादून में स्थित वन अनुसंधान संस्थान (एफआरआई) और इफको के संयुक्त
पहल पर रिसर्च शुरू हो गया है। एफआरआई ने अधिक उत्पादकता वाली नीम की पहचान के लिए जौनपुर समेत पूर्वांचल के अन्य जिलों से भी घर घर से नीम का बीज एकत्र करने की तैयारी की है। आठ साल में पूरा होने वाले इस
अनुसंधान का पहला चरण तीन साल में पूरा होगा। इसके लिए इफको ने एफआरआई को 93 लाख का बजट स्वीकृत किया है। एफआरआई देहरूदून के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. रमाकांत सिंह घर घर से नीम का बीज एकत्र करने की प्लानिंग के
लिए इन दिनों अपने पूर्वांचल प्रवास पर हैं। गुरुवार को अमर उजाला से खास बातचीत में उन्होंने कहा कि नीम बहुत गुणकारी पेड़ है। रासायनिक खादों के इस्तेमाल से उपजाऊ मिट्टी अब बीमार हो गई है। इससे फसलों की उत्पादकता घट
रही है। फसल को सुरक्षित रखने के लिए किसानों की लागत बढ़ रही है। ऐसे में अब नीम खेती के लिए वरदान साबित हो सकती है। यूपी और खास तौर से पूर्वांचल का बेल्ट नीम की खेती के लिए बेहतर पाया गया है। खाली पड़े स्थानों पर
नीम का पौधरोपड़ किया जा सकता है। लेकि न पौधरोपड़ से पहले इस बात का पता करना जरूरी है कि नीम की किस प्रजाति में अधिक बीज और अधिक तेल मिल सकता है। इसी विषय पर एफआरआई रिसर्च कर रहा है। घर घर से नीम
का 10-10 ग्राम बीज एकत्र कर उसकी नर्सरी लगाई जाएगी। पौधा तैयार होने के बाद पता चलेगा कि किस प्रजाति की नीम से अधिक बीज प्राप्त होगा । अधिक उत्पादकता वाली नीम के प्रजाति की पहचान होने के बाद उसी सरकार की मदद
से उसी प्रजाति के पौधे खाली स्थानों पर रोपने के लिए किसानों को प्रेरित किया जाएगा। उन्होंने कहा कि अनुसंधान पर होने वाले खर्च के लिए इफको से करार हुआ है। पहले चरण के लिए 93 लाख का बजट इफको ने स्वीकृत किया है।
गांव गांव और घर घर से नीम के बीज का सेंपल एकत्र करने के अभियान के तहत गुरुवार को एफआरआई के वैज्ञानिक डा. रमाकांत सिंह, केवीके के प्रभारी कार्यक्रम समन्वयक डा. अमिताभकर भी मौजूद थे।