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बसंत पंचमी आज, घर-घर होगा ज्ञान की देवी का पूजन

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जौनपुर। माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि बसंत पंचमी के नाम से विख्यात है। इस पावन पर्व का सुखद संयोग 5 फरवरी उत्तराभाद्र पद नक्षत्र और सिद्ध योग में पड़ रहा है। बसंत पंचमी के दिन से ही बसंत ऋतु की शुरुआत होती है। इस दिन विद्या की देवी मां सरस्वती की आराधना की जाती है। बसंत पंचमी का नाम आते ही जीवन में नई ऊर्जा और ऊष्मा के प्रवाह की अनुभूति होने लगती है। इसी तिथि से डेढ़ माह तक चलने वाले होलिकोत्सव की तैयारी भी शुरू हो जाती है।
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बसंत पंचमी को ऋषि पंचमी भी कहा जाता है। आचार्य भोले शंकर मिश्र बताते हैं कि पौराणिक कथाओं के मुताबिक माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को देवी सरस्वती का जन्म हुआ था। कुछ धर्म ग्रंथों में इसे देवी लक्ष्मी के जन्म दिन के रूप में मनाने का वर्णन मिलता है। इसी तिथि को यदि लौकिक प्रभाव को देखें तो मकर संक्रांति के बाद की यह महत्वपूर्ण तिथि है। जब सर्दी की गलन की कमी और भगवान भास्कर की ऊष्मा में बढ़ोत्तरी महसूस होने लगती है। प्रकृति नए शृंगार करके लगती है। खेतों में पीली पीली सरसों की चादर फैली दिखती है तो बागों में आम के बौर आने लगते हैं। कुल मिलाकर पूरा वातावरण महक उठता है और एक मस्ती के उत्सव की ओर चलने को उद्द्यत होता है। इसी तिथि पर पीले वस्त्रों में महिलाएं मां सरस्वती की पूजा करती हैं। कहीं-कहीं भगवान विष्णु व कामदेव की पूजा करने का भी वर्णन आता है। फाग गायक राम सकल उपाध्याय बताते हैं कि बसंत पंचमी तिथि की प्रतीक्षा उन होली हुड़दंग वाले युवाओं को भी रहता है, जो इसी दिन शाम को रेढ़ के पौधे को किसी निर्धारित स्थल पर खड़ा कर उसके पास उपले लकड़ी घास फूस आदि रखते हुए होलिका लगाने का कार्यक्रम शुरू करते हैं। युवाओं की टोली नित्य शाम को उस स्थान पर कुछ न कुछ होलिका दहन की सामग्री जरूर रखते हैं। यद्यपि अब इसका प्रचलन कम हो गया है, लेकिन अब भी इसी तिथि का माहात्म्य बरकरार है। पहले इसी तिथि से फाग चौताल गायकी भी शुरू हो जाती थी जो होली के बाद चैत्र माह की अष्टमी तिथि तक चलता था। इसमें भी अब कमी देखी जा रही है सिर्फ औपचारिकता रह गई है। फिर भी कुछ क्षेत्रों में अब भी यह परंपरा जीवंत है। ज्योतिष एवं तंत्र आचार्य डा. शैलेश मोदनवाल के अनुसार इस दिन पीले रंग के वस्त्र पहन कर सरस्वती मां की पूजा का विधान है। वसंत पंचमी को सभी शुभ कार्यों के लिए अत्यंत शुभ मुहूर्त माना गया है। मुख्यतया: विद्यारंभ, नवीन विद्या प्राप्ति एवं गृह प्रवेश के लिए वसंत पंचमी को पुराणों में भी अत्यंत श्रेयकर माना गया है। यह प्रकृति का उत्सव है। सरस्वती पूजन का उद्देश्य जीवन में अज्ञान रूपी अंधकार को दूर करके ज्ञान का प्रकाश उत्पन्न करना है। मां सरस्वती के साथ भगवान गणेश, सूर्यदेव, भगवान विष्णु व शिवजी की भी पूजा अर्चना करें। श्वेत फूल-माला के साथ माता को सिंदूर व अन्य शृंगार की वस्तुएं भी अर्पित करें। वसंत पंचमी के दिन माता के चरणों पर गुलाल भी अर्पित करने का विधान है। प्रसाद में मां को पीले रंग की मिठाई या खीर का भोग लगाएं। यथाशक्ति ‘ऐं सरस्वत्यै नम:’ का जाप करें। मां सरस्वती का बीजमंत्र ‘ऐं’ हैं, जिसके उच्चारण मात्र से ही बुद्धि विकसित होती है। इस दिन से ही बच्चों को विद्या अध्ययन प्रारंभ करवाना चाहिए। ऐसा करने से बुद्धि कुशाग्र होती है और मां की कृपा जीवन में सदैव बनी रहती है।
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