चौकियां क्षेत्र के लखनपुर गांव में बनाया गया आर्युवैदिक चिकित्सालय।
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जौनपुर। कोरोना काल में स्वस्थ रहने के लिए आयुर्वेदिक दवाओं के इस्तेमाल पर लोगों का रुझान बढ़ा है। अंग्रेजी तरीकों की अपेक्षा आयुर्वेदिक माध्यम से दवा-उपचार के प्रति लोगों में जागरुकता आई है, मगर विडंबना है कि जिले में आयुर्वेदिक अस्पतालों का बुरा हाल है। अधिकांश अस्पतालों में न डॉक्टर हैं और न कर्मचारी। अमूमन वहां ताला लटकता है। भवन जर्जर हो चुके हैं तो कहीं दरवाजे-खिड़की, फर्नीचर गायब हैं। भगवान भरोसे चल रहे इन अस्पतालों पर जिम्मेदारों का ध्यान नहीं है। लोगों के हेल्थ वेलनेस की बातें बस जुबानी तक सीमित हैं।
जिले में आयुर्वेद के 36 अस्पताल हैं। इनमें महज 16 चिकित्सकों की तैनाती है। कई अस्पताल तो चिकित्सक विहीन हैं। अस्पतालों में ओपीडी के बाद ताला लग जाता है। शाहगंज में 25 और चौकिया व मड़ियाहूं में 15-15 बेड का अस्पताल है। 26 अस्पतालों में चार बेड की व्यवस्था है। करीब सात अस्पतालों में ओपीडी होती है। विभागीय उपेक्षा के चलते आयुर्वेदिक चिकित्सा व्यवस्था बेपटरी हो गई है। अधिकांश अस्पतालों में पेयजल, शौचालय, मरीजों को बैठने तक की व्यवस्था नहीं है। अस्पतालों में पर्याप्त चिकित्सकों की तैनाती नहीं होने के कारण ओपीडी के नाम पर खानापूर्ति होती है। अस्पतालों में बेड तो हैं लेकिन संसाधनों की कमी के कारण मरीजों को भर्ती कर इलाज नहीं किया जाता है।
जिले में हैं नौ यूनानी अस्पताल
जौनपुर। जिले में नौ यूनानी चिकित्सालय हैं। जिसमें से एक अस्पताल में और शेष ग्रामीण क्षेत्रों में संचालित हैं। इनमें दो चिकित्सक और चार फार्मासिस्टों की तैनाती हैं। कई अस्पताल चतुर्थ श्रेणी संभाल रहे हैं। दवाओं के लिए भी धन नहीं मिलने के कारण अस्पताल बेमतलब साबित हो रहे हैं।
कोरोना काल में इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए सरकार ने बूस्टर की दवाओं की खेप पर्याप्त मात्रा में हैं। जिले के लोग अपना इलाज इन अस्पतालों में करा सकते हैं। कोरोना संक्रमण के दौरान अधिकांश अस्पतालों में ताला बंद रहा। इसके चलते दवाएं डंप पड़ी हैं। -डॉ. कमल कुमार, जिला आयुर्वेदिक अधिकारी