शासन की तमाम कोशिशों के बाद भी मेडिकल कॉलेज का काम समय से पूरा होता नहीं दिख रहा। धीमी गति से चल रहे निर्माण पर शुक्रवार को फिर ब्रेक लग गया। मजदूरी का पैसा न मिलने से नाराज मजदूरों ने दोपहर बाद काम रोक दिया। काम करा रही कंपनी टाटा प्रोजेक्ट्स के खिलाफ नारेबाजी करते हुए भुगतान की मांग की। उनका कहना था कि जब तक उन्हें पैसा नहीं मिलेगा, वह काम पर नहीं लौटेंगे।
सिद्दीकपुर स्वशासी मेडिकल कॉलेज का निर्माण वर्ष 2015 से चल रहा है। इसे 2018 तक ही पूरा करना था, लेकिन लगातार विवादों के कारण अब तक पचास फीसदी काम भी पूरा नहीं हो पाया है। काम करा रही कंपनी टाटा प्रोजेक्ट्स लगातार बजट की कमी का रोना रोता रहा है। अनुबंध की शर्तों के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए पिछले महीनों राजकीय निर्माण निगम ने अनुबंध निरस्त करते हुए कंपनी पर 30 करोड़ का जुर्माना भी ठोंका था। कंपनी को ब्लैक लिस्टेड करने की भी तैयारी थी, मगर बाद में कंपनी के अधिकारियों ने तय समय पर काम पूरा करने का वादा करते हुए कार्रवाई से राहत पाई। मार्च में नए सिरे से काम शुरू होने के बाद भी इसे रफ्तार नहीं मिल पाई है। आलम यह है कि शासन-प्रशासन एक तरफ यहां अगस्त तक हर हाल में ओपीडी सेवा शुरू करने की तैयारी में जुटा हुआ है तो दूसरी ओर काम की रफ्तार बेहद सुस्त है। महज 400 मजदूरों के भरोसे काम चल रहा है। तीन दिन पहले डीएम ने निरीक्षण के दौरान मजदूरों की संख्या बढ़ाकर एक हजार करने का निर्देश दिया था। चार दिनों बाद भी मजदूर तो नहीं बढ़े, अलबत्ता उनकी संख्या निरंतर कम होती जा रही है। कार्यस्थल की व्यवस्थाओं से मजदूर नाखुश हैं। शुक्रवार को दोपहर बाद सभी मजदूरों ने काम पूरी तरह ठप कर दिया। हाथों में तख्ती लेकर परिसर में कंपनी के अफसरों पर मजदूरी का भुगतान समय से न करने का आरोप लगाते हुए जमकर नारे लगाए। मजदूरों का कहना था कि उनसे लगातार काम लिया जा रहा है, लेकिन भुगतान नियमित नहीं हो रहा। एक-एक मजदूर का हजारों रुपये बकाया है। कार्यस्थल पर ढंग से खाने-पीने की भी व्यवस्था नहीं की गई है। अब जब तक उन्हें पैसा नहीं मिलता वह काम पर नहीं लौटेंगे।
मेडिकल कॉलेज में अगस्त से ओपीडी सेवा शुरू करने और कक्षाओं का संचालन शुरू करने के भले ही दावे किए जा रहे हैं, लेकिन मौजूदा हालात में यह संभव नहीं दिख रहा। पढ़ाई और ओपीडी के लिए जरुरी हिस्से भी पूरे नहीं हो पाए हैं। लेक्चर थिएटर का बस ढांचा खड़ा हुआ है। छत भी नहीं पड़ी है। मरम्मत और फिनिशिंग में भी काफी समय लगना है। इसी तरह एकेडमिक ब्लाक में भी 50 से 55 प्रतिशत काम ही पूरा हो पाया है। लाइब्रेरी में पूरी फिनिशिंग बाकी है। हॉस्टल व हास्पिटल का हिस्सा भी अधूरा है। इंडियन मेडिकल काउंसिल के मानकों के तहत मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई से पहले वहां पुस्तकों से सुसज्जित लाइब्रेरी, लेक्चर थिएटर, हॉस्पिटल और एकेडमिक ब्लाक का निर्माण होना जरुरी है। जानकारों के अनुसार अगस्त से पहले इस हिस्से को पूरा करने के लिए रोजाना कम से कम डेढ़ से दो हजार मजदूरों को काम करना होगा, मगर यहां चार सौ से अधिक संख्या नहीं बढ़ पा रही।
मेडिकल कॉलेज के निर्माण में सबसे बड़ा पेच बजट का है। वर्ष 2015 में जब परियोजना स्वीकृत हुई तब कुल लागत 554 करोड़ रुपये थी। काम में विलंब के कारण निर्माण सामग्री के दाम काफी बढ़ चुके हैं। कंपनी इसी का हवाला देते बजट में वृद्धि की दलील दे रही है। काफी लिखापढ़ी के बाद बजट में 43 करोड़ की वृद्धि की है, लेकिन इस पर भी शासनादेश जारी नहीं हुआ है। लिहाजा भुगतान पुराने रेट से ही हो रहा है।
राजकीय निर्माण निगम के परियोजना प्रबंधक एमपी सिंह का कहना है कि मेडिकल कॉलेज में 450 मजदूर दोपहर तक काम कर रहे थे। इसके बाद अगर किन्हीं कारणों से काम रुका है तो जानकारी नहीं है। जो भी समस्या होगी, उसका समाधान कर तय समय में मेडिकल कॉलेज का निर्माण पूरा करने का हरसंभव प्रयास किया जा रहा है।