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चार देशों में रहे राजदूत, फिर भी मिट्टी से कम नहीं हुआ लगाव

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अधिकारियों की सौगात देने वाले सिरकोनी विकास खंड के गद्दीपुर (माधवपट्टी) गांव परिचय का मोहताज नहीं है। यहां की माटी ने इंदु प्रकाश सिंह जैसा लाल दिया जिन्होंने चार देशों में भारत का प्रतिनिधित्व किया लेकिन अपनी पैतृक गांव को कभी भी नहीं भुलाया। शिक्षा के बल पर वे न सिर्फ चमके बल्कि उसके महत्व को भी बखूबी समझते थे। इसी वजह सेवा के दौरान भी वह जब भी कभी गांव आते तो गांव के बच्चों को पढ़ाई के लिए प्रेरित करते थे। उनकी प्रेरणा का असर कह सकते हैं कि 47 आईएएस, आईपीएस, पीसीएस देने वाले इस गांव की पहचान अफसरों के गांव के रूप में है
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सिरकोनी विकासखंड के गद्दीपुर गांव में स्वर्गीय ठाकुर भगवतीदीन सिंह तथा माता स्वर्गीय श्रीमती श्याम रथी सिंह के घर 1931 मेें इंदु प्रकाश सिंह का जन्म हुआ था। छह भाइयों में इंदु प्रकाश चौथे नंबर पर थे। प्रारंभिक शिक्षा दीक्षा गांव के ही प्राइमरी पाठशाला में हुई थी। इंटरमीडिएट टीडी कॉलेज से किया। मेधावी इंदु ने हाईस्कूल की परीक्षा में प्रदेश की मेरिट में छठवां तथा इंटर में प्रदेश में चौथा स्थान पाया। घर में शुरू से ही शिक्षा का माहौल था। पिता ठाकुर भगवतीदीन सिंह अंग्रेजों के समय में बीए एलएलबी थे तो माता श्यामरथी सिंह अध्यापिका थी। ऐसे घर से निकले इंदु ने उच्च शिक्षा कानपुर विश्वविद्यालय से हासिल किया। बहुआयामी प्रतिभा के धनी इंदु प्रकाश सिंह पढ़ाई के साथ खेलकूद में भी टॉपर रहे। उनके भतीजे गिरीश चंद्र सिंह बताते हैं कि कानपुर से शिक्षा ग्रहण करने के बाद इंदु प्रकाश सिंह टीडी कॉलेज में दर्शनशास्त्र के हेड ऑफ डिपार्टमेंट बनाए गए। 7 दिनों तक उन्होंने टीडी कॉलेज में पढ़ाया। लेकिन प्रशासनिक सेवा का लगाव उन्हें इलाहाबाद ले गया। लेकिन इसी बीच फिल्मों की ओर मन गया तो बीच में ही तैयारी छोड़कर मुंबई चले गए तथा फिल्म के लिए स्क्रीन टेस्ट से चुन भी लिए गए । उनके बड़े भाई राने बाबू मुंबई से जाकर इन्हें पुन: इलाहाबाद ले आए और उन्हें समझाया कि तुम आईएस पास कर लो। उसके बाद जो इच्छा होगी वो करना। भइया की बात इंदु को जंच गई और वे फिर जी जान से तैयारी में लग गए ।1955 में उन्होंने पुन: परीक्षा दी और आईएफएस. (इंडियन फॉरेन सर्विस) में टॉप किया। नौकरी के दौरान ही लंदन में डिप्टी हाई कमिश्नर रहने के दौरान उन्होंने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से पीएचडी की डिग्री हासिल की। सूडान, स्पेन, बर्मा, नेपाल में वह राजदूत रहे। सेवा के दौरान ही उन्होंने चार किताबें लिखी थी। वह हमेशा लोगों को पढ़ने लिखने के लिए ही प्रेरित करते थे। पढ़ाई में उनकी रुचि इस कदर थी कि प्रशासनिक सेवा में आने के बाद वह वेतन का दस फीसदी धन किताबों पर ही खर्च करते थे। 16 अगस्त 2002 में लंदन में इलाज के दौरान उन्होंने अंतिम सांस ली। इंदु प्रकाश सिंह के तीन बेटों में राहुल सिंह दिल्ली में व्यापार करते हैं। दूसरे बेटे अमिताभ सिंह दिल्ली में पोस्ट मास्टर जनरल है। तीसरे बेटे जन्मेजय सिंह अमेरिका में वर्ल्ड बैंक के डायरेक्टर है। इनकी पत्नी आशा सिंह का निधन 20 अप्रैल 2021 को दिल्ली में हुआ था।
पढ़नेके बाद दान कर देते थे किताबें
इंदु प्रकाश सिंह प्रशासनिक सेवा के दौरान भी अपने वेतन का दस फीसदी धन किताबों पर खर्च करते थे। खास बात यह कि पढ़ाई के बाद वह किताबों को जरूरतमंदों में दान कर देते थे। इंदु प्रकाश सिंह ने प्रशासनिक सेवा के बाद राजनीति में भी भाग्य अजमाया था। 1989 के लोकसभा के चुनाव जौनपुर सदर सीट से वह चुनाव लड़े थे लेकिन सफलता नहीं मिला। उस वक्ता भाजपा और जनता दल गठबंधन के प्रत्याशी के रूप में राजा यादवेंद्र दत्त दुबे सांसद चुने गए थे।
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