फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

देश की आजादी के लिए 27 साल कैद रहे

Thu, 14 Aug 2014 05:30 AM IST
Jaunpur
विज्ञापन
विज्ञापन
जौनपुर। जिन्हें आजादी प्यारी थी, मौत भी जिनसे हारी, किंतु अभी तक वह हैं गुमनाम...। किसी शायर की यह लाइनें आजादी के लिए अपना पूरा जीवन जेल में बिता देने वाले मुजतबा हुसैन पर बिलकुल सटीक बैठती हैं। देश को गुलामी की बेड़ी से आजाद कराने के लिए भारत मां के लाल ने जिंदगी के कीमती 29 साल जेल में गुजार दिए। अचरज की बात यह है कि देश के लिए इतनी बड़ी कुर्बानी देने वाला सेनानी अब भी गुमनाम है।
विज्ञापन

देश कोआजाद कराने के लिए जौनपुर की माटी में जन्मे कई सपूतों ने कुर्बानी दी। मुजतबा हुसैन उन्हीं सेनानियों में से एक हैं। बहुत कम लोगों को पता होगा कि उन्होंने देश को आजाद कराने के लिए विदेशी जमीन पर भी स्वतंत्रता संग्राम की नींव तैयार की। देश को आजाद देखने के बाद ही उन्होंने अंतिम सांस ली। वर्ष 1883 के आसपास शहर के चितरसारी मोहल्ले में जन्मे मुजतबा हुसैन के बारे में पीबी यादव और अधिवक्ता जयप्रकाश सिंह ने अपने तीन साथियों समर सिंह, इंद्रजीत मौर्य और इब्ने जाफर के साथ मिलकर पता किया। उन लोगों ने क्रांतिकारी मुजतबा हुसैन स्मारक समिति का गठन किया। जयप्रकाश कहते हैं कि मुजतबा हुसैन उर्दू के अच्छे जानकार थे। 1894 के आसपास उन्होंने पहली बार शहर के उर्दू बाजार मोहल्ले में अंग्रेजों के खिलाफ पहली बैठक में हिस्सा लिया। 1905 में वाराणसी में अयोजित क्रांतिकारियों के अधिवेशन में भी प्रतिभाग किया। क्रांतिकारियों से प्रभावित होकर उन्होंने 1914 में कोर्ट आफ वार्ड्स की नौकरी से इस्तीफा दे दिया। इसी दौरान वह अमेरिका चले गए। वहां उन्होंने प्रवासी भारतीयों की ओर से चलाए जा रहे क्रांतिकारी आंदोलन में भाग लिया। इसके बाद उनकी मुलाकात गदर पार्टी के नेताओं से हुई। क्रांतिकारी नेताओं ने करीब 40 केंद्र स्थापित कर लिए थे। मुजतबा हुसैन और सोहन लाल पाठक को रंगून में केंद्र स्थापित करने की जिम्मेदारी दी गई। उन लोगों ने वहां केंद्र स्थापित किया और 15 फरवरी 1915 में सैनिक विद्रोह करवा दिया। इसी के आरोप में उन्हें कई साथियों के साथ गिरफ्तार कर लिया गया।
पहले तो उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई। मुकदमे की कार्रवाई पूरी नहीं हो सकी तो सजा उम्रकैद में बदल गई। मुजतबा ने 1915 से 1937 और 1339 से 1946 तक का समय फैजाबाद और जौनपुर की जेलों में बिताए। इसके बाद जब वह रिहा हुए और अपने घर शहर के चितरसारी गए तो परिवार बिखर चुका था। परिवार वाले कुछ लोग पाकिस्तान तो कुछ कहीं और चले गए। तीन अगस्त 1953 को उनका निधन हो गया। उन्हें सदर इमामबाड़ा स्थित कब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-खाक किया गया। उन्होंने आजादी के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। समिति ने चितरसारी में स्मारक बनाकर उनकी यादें सहेजने का काम किया है।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें