खुटहन। दरबारे कादरिया गौसपीर दरगाह का फाटक मंगलवार की रात 11 बजकर 11 मिनट पर खुलते ही मस्जिद में मत्था टेकने के लिए जायरीनों का हुजूम उमड़ पड़ा। इसी के साथ यहां का सालाना उर्स भी शुरू हो गया। मस्जिद के भीतर पहुंचे जायरीन कलश में रखे गुस्ल का पानी लेने के लिए उमड़े। मान्यता है कि पानी पीने और शरीर पर छिड़क लेने मात्र से कई व्याधियों से निजात मिल जाती है। यह उर्स प्रत्येक वर्ष रबी उस्मानी की ग्यारहवें से शुरू होकर सत्रह दिनों तक चलता है। इसमें देश के विभिन्न प्रांतों से हजारों जायरीन मत्था टेकने आते हैं। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए स्थानीय थाना पुलिस के अलावा एक प्लाटून पीएसी तैनात की गई है। झारखंड बिहार से आए मो. रजा ने बताया कि भूतप्रेत के बाधा से परेशान हैं। गाजियाबाद से आए हमीद अंसारी की बेटी सफेद दाग से परेशान है। कोईरीपुर सुल्तानपुर से आए रामदेव ने बताया कि तीन वर्ष से आ रहा हूं पत्नी बीमार रहती है। आजमगढ़ से आई शबनम बानो के पति की तबियत खराब रहती है। पटटी प्रतापगढ़ से शोएब ने कहा की मत्था टेकने से सभी बाधाएं दूर हो जाती है। फरियादियों का मानना है कि यहां सच्चे मन से की गई मुरादें अवश्य पूरी होती हैं। सबसे अधिक प्रेत बाधा के निवारण के लिए लोग आते हैं। मेले मे अल्पसंख्यक समुदाय के अलावा भी हिन्दू धर्म के लोगों का भी खूब जमावड़ा होता है। दरगाह के मुतवल्ली मोहम्मद मंसूर, मोहम्मद असलम, मोहम्मद हारुन सहित दर्जनों सदस्य पुलिस के साथ व्यवस्था सुचारु बनाने में लगे रहे। जनपद मुख्यालय से लगभग 25 किमी पश्चिम गौसपुर गांव स्थित दरगाह के विषय में कहावत है कि हजरत शाह मोहम्मद उमर व शाह नगीना दोनों भाई लगभग आठ सौ वर्ष पूर्व इजारत के लिए बगदाद शरीफ गए थे। जहां से वे एक ईंट लाए थे। गौसपुर में रात्रि विश्राम के बाद उन्हें स्वप्न में बरसात हुई कि ईंट को इसी जगह एक रौजा की तामीर करके नस्ब कर दिया जाए। ताकि इस जमीन पर भी बगदाद शरीफ की तरह गौसपाक फैज का चश्मा जारी रहे। यही पाक ईंट दरगाह की गुंबद के भीतर छोटे से कुब्बे में नस्ब है। इसी कुब्बे का फाटक रबी उस्मानी की ग्यारहवें की रात जायरीनों को मत्था टेकने लिए खोला जाता है। दरगाह के दक्षिण तरफ हजरत शाह मोहम्मद उमर और शाह नगीना दोनों की मजार बनी हुई है। यहीं फरियादी चादर चढ़ाते हैं। दरगाह पर वार्षिक उर्स के अलावा भी प्रत्येक गुरुवार को अकीदतमंद पहुंचते हैं।