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मानव शरीर है पंचायती धर्मशाला: अंकिता नंद

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सतहरिया। वृंदावन धाम से पधारे कथावाचक अंकिता नंद जी ने कहा कि मानव शरीर पंचायती धर्मशाला के समान है तो इस किराए के घर शरीर से मोह करना व्यक्ति के जीवन की सबसे बड़ी भूल है। इसके मोह में फंस कर जीवन को बर्बाद करना अज्ञानता है। इसी भ्रम रुपी अज्ञानता को दूर करना श्रीमद्भागवत कथा कल्याणकारी सूत्र है। वह मुंगराबादशाहपुर स्थित शक्ति पीठ मां काली मंदिर में श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन भक्तों के बीच प्रवचन कर रहे थे।
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उन्होंने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा को पढ़ने व श्रवण करने से मुक्ति के साथ जीवन के सारे विकार दूर हो जाते हैं। शरीर मिट्टी सदृश्य है। उसे इसमें मिल जाना निश्चित है। शरीर हाड़ मांस तथा रक्त सिंचित ढांचा से बना है, जिसका नष्ट होना भी तय है। व्यक्ति का इसके सजाने संवारने के चक्कर में फंसना पागल पन नहीं तो क्या है। स्वामी ने कहा कि प्रभु द्वारा दिए गए दिव्य उपहार मानव जीवन है। फिर आज का मानव अपना असली घर परलोक धाम को सजाने के बजाय किराए का घर इहलोक को सजाने के मकड़जाल में फंस कर जीवन का मूल्यवान समय को खो दे रहा है। उसे ऐसे खोए हुए अवसर के लिए पछताने के सिवाय उसके हाथ कुछ नहीं लगेगा। मानव जीवन यात्रा लक्ष्य रहित और दु:खद न हो इसके लिए पड़ाव पर पहुंचने के पहले यानी मृत्यु के पूर्व जीवन यात्रा के दौरान समर्पण भाव से प्रभू भक्ति में लीन हो जाना चाहिए। यही मानव के लिए लक्ष्य पूर्ण आनंद भरी जिंदगी है। उन्होंने कहा कि जीवन जीने की कला को सीखने के लिए मन की चंचलता नहीं उसमें एकाग्रता की जरूरत है। जो सत्संग में सीखने को मिलता है। मुक्ति के लिए गोकर्ण जी महराज तथा धुंधकारी कथा प्रसंग पर विस्तार से प्रकाश डाला। मुख्य यजमान विमला जायसवाल परिवार संग कथा श्रवण कर रही है।
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