जौनपुर। साधारण हैंडपंप तो पहले ही पानी छोड़ चुके हैं। अब इंडिया मार्का टू हैंडपंप भी पानी छोडने लगे हैं। मार्च महीने में ही करीब 10 फीसदी हैंडपंप पानी छोड़ चुके हैं। कुएं और तालाब भी पहले ही सूख चुके हैं। करीब दो सौ फीट नीचे से पानी निकाल रहे इंडिया मार्का टू हैंड पंप भी साथ छोड़ देंगे तो पानी का संकट और गहरा होने से इनकार नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर जल संरक्षण के लिए जिम्मेदार के लोग जन जागरूकता का ढिंढोरा पीटकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाते हैं। आज भी किसान परंपरागत तरीके से ही खेती की सिंचाई करते हैं। फौव्वारा और टपक विधि जैसी सिंचाई की नई तक्नीक को अभी तक किसानों तक नहीं पहुंचाया जा सका।
बारिश लगातार कम हो रही है। धरती का सीनी चीर कर पानी निकालने के संसाधन तो खूब बढ़े पर पानी से खाली हो रही धरती की कोख भरने के लिए कोई खास इंतजाम नहीं हुए। वाटर लेबल रीचार्ज करने के लिए सरकार की ओर से जो योजनाएं चलाई भी जा रही उनका धरातल पर कहीं अता पता नहीं है। पांच नदियों वाले इस जिले की गोमती नदी को छोड़ चार नदियां पूरी तरह सूख गई हैं। नदी के किनारे के गावों में भी जल स्तर तेजी से नीचे खिसक रहा है। कुएं पहले से ही सूख चुके हैं अब जहां तहां इंडिया मार्का टू हैंडपंप भी जवाब दे रहे हैं।
लगातार नीचे खिसकते जल स्तर का आलम यह है कि 21 विकास खंडों वाले इस जिले के 11 ब्लाक डार्कजोन घोषित किए जा चुके हैं। डार्क जोन वाले विकास खंडों में पानी जमीन की ऊपरी सतह से 90 फीट से 120 फीट नीचे चला गया है। जो विकास खंड डार्क जोन में नहीं हैं वहां भी पानी का स्तर निरंतर नीचे खिसक रहा है। सामान्य ब्लाकों में जहां वर्ष 2009-10 में 35 से 40 फीट नीचे पानी मिल जाता था उन्हीं विकास खंडों में अब 65 से 70 फीट नीचे पानी की सतह है। यानी आठ सालों के दरम्यान पानी का स्तर 20 फीट तक नीचे खिसक गया। हालांकि नहरों से घिरे बरसठी और धर्मापुर ब्लाक वर्ष 2018 में डार्कजोन से बाहर हुए हैं। जिले में सई, गोमती, पीली, बसुई और बरुणा पांच प्रमुख नदियां हैं। जिसमें गोमती और सई नदी को छोड़ सभी नदियां सूख चुकी हैं। गोमती नदी का भी जल स्तर लगातार घट रहा है।
बिना रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम के पास कर दिया जा रहा नक्शा
जौनपुर। वाटर लेबल रीचार्ज करने के लिए सभी सरकारी और गैर सरकारी भवनों पर रेन वाटर हावेस्टिंग सिस्टम को वर्ष 2006 से अनिवार्य किया गया है। लेकिन शहर में हर साल बड़ी संख्या में भवनों का निर्माण हो रहा है लेकिन उनका नक्शा बिना मानक पूरा किए ही पास कर दिया जा रहा है।
पानी का मनमानी दोहन कर रहे आरओ प्लांट
जौनपुर। शहर से लेकर गांव तक जगह-जगह आरओ प्लांट स्थापित हो गए हैं। इन आरओ प्लांट से 70 फीसदी पानी बर्बाद होने के बाद महज तीस फीसदी पानी पीने लायक बनाया जाता है। बाकी पानी जो वेस्ट होता है उसे जमीन के अंदर डालने की भी कोई व्यवस्था इन आरो प्लांट संचालकों की ओर से नहीं की गई है। इनके पास न तो कोई लाइसेंस है और न ही वे मानक ही पूरा कर रहे हैं।
तेजी से नीचे खिसक रहा भू-गर्भजल
जौनपुर। भू-गर्भजल दोहन के लिए संसाधन लगातार बढ़ रहे लेकिन जमीन के अंदर पानी डालने का कोई इंतजाम नहीं किया जा रहा। पहले पानी की जरूरतें लोग कुएं से पूरी करते थे लेकिन अब हालात यह हैं कि मकान बनने से पहले बोरिंग होती है और सबमर्सिबल लग जाता है। ऐसे में पानी की जो जरूरत एक से दो बाल्टी में पूरी हो जाती थी उसी के लिए अब पचासों बाल्टी पानी बर्बाद कर दिया जाता है। पहले अधिकतर जमीन कच्ची थी जिससे बारिश का पानी जमीन के अंदर चला जाता था लेकिन अब सड़क या मकान के रूप में जमीन का बहुत सा हिस्सा पक्का हो गया है जिससे बारिश का पानी नाली और नालों के माध्यम से बह जाता है और धरती की प्यास नहीं बुझ पाती। बारिश में भी भारी कमी आई है। करीब पांच साल पहले तक जिले में बारिश का औसत 800 से 900 एमएम था जो अब सिमटकर 250 से 300 एमएम तक हो गया है।
जिले में खोदे गए 1800 तालाब
जौनपुर। मनरेगा योजना जब से शुरू की गई तब से लेकर वित्तीय वर्ष 2018-19 तक जिले के सभी 21 विकास खंडों में अबतक 1800 तालाबों का निर्माण कराया गया है। वारिश का पानी संचय के लिए गांव गांव में तालाब खोदवाए गए हैं। पेयजल के लिए जिले में कुल 51502 इंडिया मार्का टू हैंडपंप लगाए गए हैं जिसमें से
2889 हैंडपंप खराब हैं।