महराजगंज। पान की खेती किसानों के लिए घाटे का सौदा साबित हो रहा है। मेहनत के बाद भी लागत निकाल पाना मुश्किल हो रहा है। जिसके चलके युवा पीढी पान की खेती में खास रुचि नहीं ले रही है। गर्मी के मौसम में पान की सिंचाई करने में पसीने छूट जाते है। किसी तरह सिंचाई तो हो जा रही है लेकिन पान की खेती में लगने वाले रोग से किसान को समुचित लाभ नहीं मिल पा रहा है। जिससे पान की खेती घाटे का सौदा बन गई है। पान की खेती से जहां पहले किसानों का पूरा जीवन यापन चलता था, वही अब इस पाने में रोग का प्रकोप बढ़ने से फायदा कम गया है। पान की खेती की शुरुआत लता से होती है। पहले बरेजा (पान का भीटा) तैयार करने में बांस व सरपत की आवश्यकता होती है। इसके बाद पान की लता की जरूरत पड़ती है। बरेजा तैयार होने के बाद लता लगाया जाता है। शरद ऋतु के बाद लता सूखने लगती है। इसलिए फरवरी व मार्च के महीने में लता बड़ी मुश्किल से मिलती है। सिंचाई के लिए तालाब, हैंडपंप,कुँए से पानी लेकर घड़े या सुराही में भरकर पान के पत्तों पर हाथ से फौव्वारा की तरह पत्ती पर पानी डाला जाता है।
क्षेत्र दो बेरायटी है जिसमे देशी सांची व लाल बंगला पान है। इनका प्रमुख बाजार जौनपुर व वाराणसी है। पान में लगने वाले गान्धी रोग, वर्षात के मौसम में इस रोग से पान का पत्ता सड़ जाता है, उसके बाद पौधे भी सड़ जाते हैं और खेती नष्ट हो जाती है। उकठा रोग पौधों के जड़ो को नीचे से समाप्त कर देता है। पौधा पूरी तरह सूख जाता है। बकटा रोग इस रोग से पान की पत्ती सिकुड़ जाती है और उनका विकास रुक जाता है। लाफा रोग वर्षात के पश्चात धूप होते ही इस रोग से पत्तियाँ सड़ने लगती हैं। जिला प्रशासन द्वारा 2014 में चयनित किसानों को उद्यान विभाग प्रोत्साहन राशि दिया गया था। उसके बाद बरेजा का 500 वर्ग मीटर व 1500 वर्ग मीटर निर्धारण करने के बाद कुछ किसानों को अनुदान मिला बाकि छोटे माप वाले किसान इससे वंचित रह गए। वर्तमान समय में ब्लॉक के उदयभान पुर,कोल्हुआ,इब्राहिमपुर,मनिकापुर,मस्थरी आदि गांवो में परम्परागत चौरसिया बिरादरी के किसान करते हैं। किसान लालजी चौरसिया ने बताया कि 2014 में अनुदान मिला था। उसके बाद नहीं मिला। बलराम, जगदीश, कमलेश, लालचंद,दीपक,महेंद्र,विनोद चौरसिया,राकेश आदि ने बताया कि पान की खेती अब घाटे का सौदा हो चुकी है।