शाहगंज। श्री बजरंग नव युवक रामलीला समिति गोड़िला द्वारा आठवें दिन लक्ष्मण शक्ति, विभीषण शरणागत, अंगद रावण संवाद का मंचन हुआ। रावण दरबार में विभीषण के मुंह से प्रभु श्रीराम की महिमा का बखान सुनते ही प्रभु के जायकारों से लीला मैदान गूंज उठा। जब प्रभु श्रीराम की सेना लंका में पहुंची तो रावण ने विचार विमर्श के लिए सभा का आयोजन किया। प्रभु श्रीराम भक्त विभीषण ने अपने भाई रावण को भगवान राम की शक्ति तथा उनकी महिमा के बारे में बताया। अपना सुझाव दिया कि वह मां सीता को सम्मान के साथ वापस कर भगवान राम से संधि कर लें। इसी में समूचे लंका की भलाई है। किन्तु अहंकारी रावण भाई विभीषण के इस विचार को सुनकर आग बबूला हो गया। कहा कि उन दोनों तपस्वी ने बहन शूर्पणखा की नाक नहीं लंका पति रावण की नाक काटी है। जिसमें इसके लिए प्रतिशोध की भावना नहीं जागी उसे लंका में एक क्षण भी रहने का अधिकार नहीं है। रावण ने भाई विभीषण को लात मारकर लंका से बाहर कर दिया। प्रभु राम भक्त विभीषण रामादल में जाकर श्रीराम के चरणों में शरणागत हो गए। उसके बाद युद्ध में मेघनाद द्वारा लक्ष्मण के ऊपर ब्रम्हास्त्र का प्रयोग करने से लक्ष्मण मूर्छित हो गए। सूचना मिलते ही राम दल में मायूसी सी छा गई। भाई लक्ष्मण को मूर्छित देखकर प्रभू श्रीराम गम में डूब जाते हैं। वह फूट फूटकर रोने लगे। प्रभु श्रीराम के विलाप दृश्य देख श्रद्धालुओं की आंखें भीग गई। तभी संकट मोचन हनुमान ने द्रोणगिरि पर्वत से संजीवनी बूटी लाकर आ जाते हैं। सुखेन वैद्य द्धारा भाई लक्ष्मण को संजीवनी बूटी देते ही लक्षमण होश में आ गए। लक्ष्मण के होश में आते ही श्रीराम के नारे से पूरा पण्डाल गूंज गया।