जौनपुर। कार्तिक मास की प्रबोधिनी एकादशी को भगवान विष्णु क्षीरसागर की शैया से जागे। उनके जागरण पर लोगों ने गा-बाजकर खुशियां मनाईं। हर आंगन में तुलसी का विवाह पारंपरिक विधि विधान से कराया गया। खेतों में गन्ना की पूजा की गई।
महिलाओं ने घर के आंगन को साफ कर विधि विधान के साथ तुलसी का पूजन कर विवाह किया। तुलसी को वस्त्र, गहने और सुहाग के सामानों को चढ़ाकर विवाह की रस्म को पूरा किया। एकादशी को लेकर बाजारों में सुबह से चहल पहल रही। जगह-जगह गन्न, शकरकंद और सिंघाड़ा की दुकानें सज गई थी। व्रती लोगों ने सिंघाड़ा और कंद की जमकर खरीददारी की। गन्ने का भाव तो आसमान छू रहा थी। शहरी इलाकों में 40 से 50 रूपये जोड़ा गन्ना की बिक्री हुई। ऐसी मान्यता है कि एकादशी के दिन गन्ना की पूजा के बाद से लोग नए गुड़ और गन्ने का सेवन करना शुरू कर देते हैं। कंद और सिंघाड़ा 25 से 30 रुपये किलो बिका।हिंदू मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु लगभग चार महीने के बाद अपनी नींद से जागते हैं। कहते हैं कि इस दिन उन्होंने सबसे पहले हरिवल्लभ तुलसी की ही प्रार्थना सुनी थी। तभी से एकादशी के दिन महिलाएं तुलसी की पूजा करने के साथ विधि विधान से उनका विवाह करती है। शालिग्राम और तुलसी का विवाह विष्णु व महालक्ष्मी के विवाह का प्रतीकात्मक माना गया है। यह व्रत एकादशी को शुरू होता है और द्वादशी को खोला जाता है। ऐसी मान्यता है कि एकादशी के दिन से सभी तरह के सुभ कार्य शुरू हो जाते हैं। अधिकांश लोगों ने एकादशी के दिन अपने घरों को दीपक और झालरों से सजाया। तुलसी विवाह को लेकर घरों में काफी उत्साह रहा। बाजार में मालाफूल की भी जमकर बिक्री हुई। व्यावसायियों ने भी अपने प्रतिष्ठानों में पूजा किया।