जौनपुर। बिठुर के महामंडलेश्वर डा. विनय स्वरूपानंद सरस्वती ने कहा कि परमात्मा के लिए सृ ष्टि के सभी जीव एक समान हैं। सभी पर उसकी कृपा बरसती रहती है। पर हम अपनी पाप रूपी छरती के कारण उसकी कृपा से वंचित हो रहे हैं। ईश्वर पर भेदभाव बरतने का आरोप लगाते रहते हैं। ईश्वर तो अपने भक्तों के भाव का भूखा होता हैं।
मां के महत्व का बखान करते हुए कहा कि बालक से युवा और अधेड़ हो जाने पर भी मां के प्रेम में तनिक भी कमी नहीं आती है। जैसे-जैसे ज्ञान अर्जित हो जाता है स्वा भाविक रूप से उसकी चिंता कम होने लगती है। ठीक यह हाल परब्रह्म परमेश्वर का है। ऋषि मु नियों की आयु सौ से हजार वर्ष होने का रहस्य बताते हुए कहा कि परमेश्वर किसी के उम्र की निर्धारण नहीं करता। अपितु उसे निर्धारित सांसे प्रदान करता है। अपनी गिनी गिनाई सांसों को उनमुक्त रूप से लुटाता है अथवा उसे संभालकर खर्च करता है यह उस पर निर्भर करता है। प्राणायाम से सांसों को नियंत्रित करके दीर्घायु बनाया जा सकता है। सांसों का कोटा खत्म यानी जीवन समाप्त। हमारे श्रृषि मुनि सांसों को महारंध्र में चढ़ाकर तप में लीन हो जाते थे। जिससे सांसों का क्षरण कम हो जाता था। हजारों वर्ष तक समाधि की अवस्था में रहा करते थे। प्राणायाम पर प्रकाश डालते हुए कहा कि साष्टांग दंडवत करने और शीश झुकाने से भी सांसे काफी हद तक नियंत्रित हो जाती है। हर किसी को नियमित रूप से प्राणायाम करने की आदत डालनी चाहिए। मानव के सर्वांगीण विकास के लिए उसे सुबह उठना चाहिए। प्रार्थना करनी चाहिए। प्राणायाम करने के साथ प्रेम करना चाहिए। इससे पहले पूर्व सांसद के पुत्र डब्बू सिंह और बीएचयू के प्रो. आरएन त्रिपाठी ने दीप प्रज्वलित कर और मानस शिरोमणि राजाराम त्रिपाठी के उद्बोधन से कथा की शुरूआत हुई। माल्यार्पण कर महामंडलेश्वर का स्वागत किया। इस मौके पर मुंबई के उद्योगपति उदय प्रताप सिंह, समाजसेवी श्यामसुंदर मिश्र, मंदिर समिति के अध्यक्ष ओम प्रकाश सिंह, उत्तराखंड से पधारे डा. सचिन ठाकुर, जय सिंह, जमींदार सिंह, राजेश जायसवाल, रामआसरे सेठ, शकुंतला शुक्ला, शशि जी आदि मौजूद थी।