बरसठी। शंकराचार्य स्वामी नारायणानंद तीर्थ ने कहा कि श्रद्धा के बिना यज्ञ, दान या तप के रूप में जो भी किया जाता है, वह नश्वर है। वह असत कहलाता है और इस जन्म तथा अगले जन्म दोनों में ही व्यर्थ जाता है। चाहे यज्ञ हो, दान हो या तप हो, बिना आध्यात्मिक लक्ष्य के व्यर्थ रहता है। प्रत्येक कार्य कृष्ण भावनामृत में रहकर ब्रह्म के लिए किया जाना चाहिए। वह क्षेत्र के असवां रामपुर गांव के सिद्धनाथ बाबा सिद्धार्थश्रम में चल रहे श्रीमद्भागवत ज्ञान यज्ञ के चौथे दिन भक्तों को बीच प्रवचन कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि समस्त वैदिक आदेशों के पालन का चरम लक्ष्य कृष्ण को जानना है। इस सिद्धान्त का पालन किए बिना कोई सफल नहीं हो सकता। इसीलिए सर्वश्रेष्ठ मार्ग यहीं है कि मनुष्य प्रारम्भ से ही किसी प्रामाणिक गुरु के मार्ग दर्शन में कृष्ण भावनामृत में कार्य करें। सब प्रकार से सफल होने का यही मार्ग है। पूज्य शंकराचार्य ने बताया कि वृद्ध अवस्था में लोग देवताओं, भूतों या कुबेर जैसे यक्षों की पूजा के प्रति आकृष्ट होते हैं। यद्यपि सतोगुण, रजोगुण तथा तमो गुण से श्रेष्ठ है, लेकिन जो व्यक्ति कृष्ण भावनामृत को ग्रहण करता है, वह प्रकृति के इन तीनों गुणों को पार कर जाता है। यद्यपि क्रमिक उन्नति की विधि है। किन्तु शुद्ध भक्तों की संगति से यदि कोई कृष्ण भावनामृत ग्रहण करता है तो सर्वश्रेष्ठ मार्ग है। इस प्रकार से सफलता पाने के लिए उपयुक्त गुरु प्राप्त करके उसके निर्देशन में प्रशिक्षण प्राप्त करना चाहिए। तभी ब्रह्म में श्रद्धा हो सकती है। जब कालक्रम से यह श्रद्धा परिपक्व होती है, तो इसे ईश्वर प्रेम कहते हैं। यही प्रेम समस्त जीवों का चरम लक्ष्य है। अत: मनुष्य को चाहिए कि सीधे कृष्ण भावनामृत ग्रहण करे। इस अवसर पर अशोक शुक्ल, हरि शुक्ल, सोनू सिंह, अखिलेश तिवारी अकेला, विजय शंकर पांडेय, परमानंद मिश्र, विष्णु जायसवाल, व विकास नंदन मिश्र ने पादुका पूजन व माल्यार्पण कर सत्संग लाभ प्राप्त किया।