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आपसी सौहार्द की मिसाल है गुलजारगंज की राम लीला

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सिकरारा। क्षेत्र की जय श्रीराम रामलीला एवं नाट्य समिति का इतिहास काफी पुराना है। साम्प्रदायिक सौहार्द की अनूठी मिसाल पेश करने वाली इस राम लीला में कभी धर्म सम्प्रदाय अथवा जातिगत भेद आड़े नहीं आया। इसी बाजार के मूल निवासी तथा लीला के वरिष्ठ कलाकार बजरंग बली के चरित्र को मंच पर जीवंत करने वाले अच्छे लाल मोदन वाल बताते हैं कि यहां की राम लीला लगभग आठ दशक पूर्व बाजार के प्रमुख व्यवसायी छेदी हलवाई के अहाते में प्रारम्भ हुयी थी। बाद में प्राथमिक विद्यालय के पास मैदान में तख्त लगा कर मंचन प्रारंभ हुआ। आपसी सहयोग से अब विशाल मंच तैयार है।
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राम लीला की नींव साम्प्रदायिक सौहार्द पर टिकी है। बाजार के दर्जी बिरादरी के स्व. मुहम्मद मुन्ना मास्टर पूरे मनोयोग से लीला में सक्रिय रहते थे। बाद में उनके दो बेटे मुहम्मद शब्बीर व शरीफ इसके केंद्र बिंदु में बस गए। चाहे राजा दशरथ का चरित्र हो अथवा श्रीराम का चाहे संवाद लेखन हो अथवा गीत रचना या मेकअप सारी विधाओं में दोनों भाई लगभग बीस वर्ष तक सक्रिय रहे। उन्होंने कई जिलों में गुलजारगंज की राम लीला का झंडा लहराया। उन्हीं दिनों जनपद और मंडल स्तर पर आयोजित लीला व नाट्य प्रतियोगिताओं में यह समिति कई बार विजेता बन कर आई थी। आज भी उस परिवार के युवा कलाकार रामलीला में पूरी तरह समर्पित रहते हैं। टेकारी गांव के जगदम्बा सिंह, शंकर सिंह तथा बाजार के जगन्नाथ हलवाई की सक्रियता से सारा काम सुव्यवस्थित होता रहा। लंकेश के रूप में दलित बिरादरी के महेंद्र कुमार तथा निषाद के रूप में पतिराम का अभिनय आज भी मील का पत्थर है। वह बताते हैं कि टीवी व चलचित्र के युग में मंचीय रामलीला तथा नाटक में लोगों का आकर्षण घटा है लेकिन आज भी इस मंच से संपादित कार्यक्रम में दर्शक उपस्थित रहते हैं। आज भी इसके कलाकार दूर शहरों से आकर लीला में भाग लेते हैं। आस पास के लोगों को यहां की लीला, भरत मिलाप तथा कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की पंचमी को लगने वाले विशाल मेले की प्रतीक्षा रहती है।
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