मछलीशहर। जीवितत्पुत्रिका-व्रत आश्विनमास के कृष्णपक्ष की अष्टमी को पुत्रवती महिलाएं अपने पुत्र के दीर्घायु होने के लिए रखती है। यह व्रत सन्तान को बला एवं कष्टों से बचाता है और उनके जीवन को दीर्घायुत्व प्रदान करता है। मान्यता है कि ऐसी महिलाएं जिनके पुत्र होते है, किन्तु जीवित नहीं बचते, उनके द्वारा जीवितत्पुत्रिका-व्रत के रखने से पुत्र जीवित रहने लगते है। इस व्रत के प्रभाव से ही अश्वत्थामा के अमोघ अस्त्र से उत्तरा के गर्भ की रक्षा हुई थी और परीक्षित को भी जीवनदान मिला था। पंडित मुरारीश्याम पांडेय के बताया कि शास्त्रों में व्रत के महात्म्य के बारे वर्णित कथा के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तरा के गर्भ में सूक्ष्म रूप में प्रविष्ट होकर अश्वत्थामा के अमोघ अस्त्र को अपने ऊपर ले लिया और उत्तरा के गर्भ में पल रहे गर्भ की रक्षा की। तभी से यह व्रत ‘जीवित्पुत्रिका’ के नाम से विख्यात हुआ। व्रत करने के विधान को बताते हुए डा. शैलेश मोदनवाल कहते है कि आश्विन कृष्णा अष्टमी के दिन स्नानादि से निवृत्त हो, भगवान सूर्यनारायण की प्रतिमा को स्नान कराकर गन्ध पुष्पाक्षत, धूप-दीपादि से उनकी पूजा की जाती हैं। बाजरे व चने से बना भोग अर्पित किया जाता है। इस दिन स्त्रियां उड़द के कुछ साबूत दाने निगलती है। जिसके माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण के सूक्ष्म रूप को उदर में प्रवेश कराने की मान्यता है। इस दिन गेंहू तथा उड़द के दान का विशेष महत्व है।पर्व पर ब्राह्मण को भोजन कराया जाता है तथा उन्हें दान-दक्षिणा दी जाती है। इस दिन व्रती महिलाएं अपने पुत्रों के गलें में काले अथवा लाल रंग के रक्षासूत्र या धागे को पहनाती है। 24 घंटे के उपवास के बाद दूसरे दिन ब्रह्म बेला में दही चिउड़े का भोग लगाकर उसका कुछ भाग पशु-पक्षियों के लिए निकाला जाता है और प्रसाद के रूप में महिलाएं ग्रहण करती है।यह पर्व इस वर्ष 2 अक्टूबर को पड़ रहा है।