जलालपुर। श्रीमद्भागवत भक्ति ज्ञान वैराग्य की त्रिवेणी है। इसके अविरल प्रवाह में प्राणी मात्र के कल्याण की कामना निहित है। यह बातें पं.ओंकारनाथ दुबे ने शुक्रवार रात छातीडीह गांव निवासी पं. चंद्रेश मिश्र के आवास पर चल रही श्रीमद्भागवत कथा में देवर्षि नारद व वेदव्यास के मिलन की चर्चा करते हुए कहा।
उन्होंने एकादशी व्रत निष्ट राजा अंबरीश और महर्षि दुर्वासा की चर्चा करते हुए कहा कि पूर्वाग्रह से किया गया कार्य सार्थक नहीं होता है। दुर्वासा को भक्त अंबरीश के समक्ष नतमस्तक होना पड़ा। अंबरीश ने महर्षि दुर्वासा को हृदय से लगा लिया और उनका चरण धोकर चरणामृत लिया।भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि अहंकार व घमंड विनाश का सबसे बड़ा कारण है। कंस जैसा मामा को अहंकार के मद में चूर होना उनके लिए भारी पड़ गया। उन्हाेंने कहा कि भारतीय संस्कृति से हमें दया, दान, धर्म जैसी चीजें मिलती हैं, जो किसी दूसरी संस्कृति में संभव नहीं है। आरती वंदन पं. भूषण मिश्र व जड़ावदेवी ने किया। इस अवसर पर कुटीर संस्थान के प्रबंधक डा.अजयेंद्र कुमार दुबे, मार्कंडेय मिश्र, मनोज सिंह, कृपा शंकर यादव, ध्रुवनाथ चौबे, ज्ञानेश्वर, श्यामजीत पांडेय, अश्वनी कुमार मिश्र,बृजवासी देवी, उर्मिला देवी, मालती देवी व राजेश शुक्ल आदि उपस्थित रहे।