जौनपुर। नौहा की मार्मिक लाइनें जैसे ही अंजुमन हैदरिया कुरापट्टी ने पढ़ी तो अजादारों की आंखें नम हो गईं। चारों तरफ से रोने बिलखने की आवाज गूंजने लगी । तीसरी मोहर्रम शुक्रवार को शहर के कुरापट्टी खानपट्टी के इमाम बारगाहों में गम-ए-हुसैन की सदाएं गूंजने लगीं।
अंजुमन हैदरिया के साहबे बयाज एहतिशाम अब्बास, दिलशाद अली ने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की छह माह की बच्ची जनाबे सकीना का नौहा पढ़ा, जिससे पूरा वातावरण गमगीन हो गया । इसके साथ ही हजरत इमाम हुसैन (अस) की याद में रखा जाने वाला जरीह और ताजिया भी अकीदतमंद खरीदकर घर लाने लगे। इमाम बारगाह खानपट्टी में मजलिस को खिताब करते हुए मौलाना जैनुलआब्दीन ने हजरत इमाम हुसैन की शहादत पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हजरत इमाम हुसैन ने अपनी व अपने संबंधियों की शहादत देकर इस्लाम धर्म की हिफाजत की। इमाम हुसैन की शहादत को याद करके मुहर्रम में इंसानियत पसन्द लोग शोक मनाते हैं एवं नौहा व मातम करते हैं। जाकिरे अहलेबैत दिलशाद अली ने कहा कि करबला हमें जुल्म से नफरत और मजलूम से मोहब्बत करने का पैगाम देती है। नफरत का जज्बा इंसान को जालिम बना देता है, जबकि मोहब्बत इंसान को फरिश्ते से भी बुलंद मुकाम अता करती है। उन्होंने कहा कि करबला में इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों की कुर्बानी आज भी हर इंसान के लिए नमूना ए अमल है। मोहर्रम का महीना इन्हीं शहीदों की याद है, जिसमें लोग इमाम हुसैन व उनके साथियों की कुर्बानी याद करते हैं । नौहाख्वानी व सीनाजनी करते हैं । उनकी याद में काला लिबास पहनते हैं । यह सिलसिला दसवीं मोहर्रम तक जारी रहता है। इस मौके पर सैय्यद अली , गुलामुस्सकलैन , नौशाद अली , मोहम्मद हसन , जीशान हैदर , शाहिद अल्वी , आरिफ हुसैनी , कासिद अली सहित बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे ।