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बुद्धि प्रदायक देव गणेश का पूजन है फलदायी

वाराणसी ब्यूरो Updated Thu, 13 Sep 2018 12:09 AM IST

मछलीशहर। गुरूवार से भगवान गणेश का पूजनोत्सव आरम्भ हो रहा है। पूजा पंडालों में गणपति बप्पा की मूर्ति स्थापित कर भक्त एक सप्ताह पूजा के पश्चात विसर्जन करते हैं। बुधवार को पूजा पंडालो के लिए गणेश की मूर्ति जयकारे लगाते हुए रवाना हुई। पं. मुरारीश्याम पाण्डेय ने बताया कि भविष्यपुराण के अनुसार चतुर्थी तिथि के तीन भेद है, भाद्रपदमास की शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि को ‘शिवा’ कहते है, किसी भी मास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी यदि मंगलवार के दिन पड़े तो वह ‘सुखा’ कहलाती है जबकि माघमास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी को ‘शान्ता’ कहते है। शिवा चतुर्थी के दिन गणेश जी का प्राकट्य होने के कारण इस दिन किया गया स्नान, व्रत, जप व दान भगवान गणपति की कृपा से सौ गुना अधिक फलदायी होता है। इस तिथि के दिन गुड़, लवण और घृत का दान विशेष शुभकर माना जाता है। इस दिन भगवान गणेश के पूजन का विशेष फल प्राप्त होता है। शास्त्रों में दूर्वा को अत्यन्त पुनीत कहा गया है, क्योंकि इसकी उत्पत्ति भगवान विष्णु के रोम से हुई है। दुर्गा को छोड़ सभी देवताओं को यह अत्यन्त प्रिय है। गणेश के पूजन में तो दूर्वा अनिवार्य माना जाता है। ज्योतिषविद् डा. शैलेश मोदनवाल के अनुसार गणेश का पूजन यदि उनके एक हजार नामों का स्मरण करते हुए हजार दूर्वा व हजार मोदकों को अर्पित करके किया जाए, तो इससे गणेश जी विशेष प्रसन्न होते है और साधक के अभीष्ट कामनाओं की पूर्ति होती है। शिवा चतुर्थी को गणेश का पूजन पांच वर्ष तक लगातार करने वाले उपासक को इस लोक और परलोक के शुभ भोगों को प्राप्त कर लेता है। ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार भगवान गणेश सिद्ध, सिद्धिस्वरूप, सिद्धिदाता एवं सिद्धि के साधन है, और इनकी भक्ति संसार सागर से पार होने के लिए नौका के समान है। शांता चतुर्थी तिथि के दिन चंद्र दर्शन अनिवार्य कहा गया है। जबकि शिवा चतुर्थी की रात चन्द्र दर्शन को निषेध माना गया है। जो चन्द्रमा देखता है, उसे झूठा कलंक लगता है। अनचाहे चन्द्रमा के दिख जाने पर स्यमन्तक मणि की कथा सुनकर दोष का निवारण किया जा सकता है।
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