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अंग्रेजों के खौफ से पेड़ पर लटकता रहा रामानंद व रघुराई का शव

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नेवढ़िया। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में संग्राम सिंह ने अंग्रेजों के नाक में दम कर रखा था। अपने साथियों के साथ उन्होंने कंपनी की फौज से आजीवन लोहा लिया। उन्होंने ऐलान किया था कि अंग्रेज उन्हें नहीं पकड़ सकते है। उनकी शहादत कहां हुई, इसका पता अंत तक नहीं चल पाया। उनके इसी तेवर के चलते उन्हें बागी की उपाधि लोगों ने दी थी।
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संग्राम सिंह नेवढ़िया के जमींदार परिवार से थे। उनका जन्म 1822में हुआ था। जब वह 12 वर्ष के तभी अंग्रेज सिपाहियों द्वारा एक महिला उत्पीड़न देख कर उनका खून खौल गया था। उन्होंने गोरे सिपाही पिटाई कर दी। उसके बाद तो अंग्रेजों उनकी जानी दुश्मनी हो गई। संग्राम सिंह का कोट बीस बीघे का था और जिस हवेली में रहते थे वह सात बीघे में थी। उनका खुदवाया तालाब आज उनकी स्मृति की धरोहर है। कोट पर ही विजय दशमी पर मेला लगता था। 1857 में जब देश में क्रांति का बिगुल बजा तो वह अपने साथियों जयलाल तिवारी, जुगुल तिवारी, लखपति गिरी, हाथीराम आदि के साथ जंग में कूद पड़े। उन्होंने अंग्रेजों के नाक में दम कर रखा था। कई बार उनकी अंग्रेजों से मुठभेड़ हुई। बार-बार संघर्ष के बाद भी वह अंग्रेजों के हाथ नहीं आए। उनका ऐलान था कि कोई अंग्रेज सिपाही उन्हें गिरफ्तार नहीं कर सकता। आखिर में हुआ भी यहीं उनका जन्म तो सबको पता है लेकिन मृत्यु कब हुई कोई नहीं जानता। अंग्रेजों ने उनके मृत्यु को राज बनाये रखा। क्षेत्र में आज भी बागी संग्राम सिंह के गाथाओं की चर्चा तो होती है लेकिन इतिहास के पन्नों में उनकी गौरव गाथा दर्ज नहीं है। लेखक श्रीनाथ द्विवेदी की पुस्तक ‘ संग्राम सिंह’ से उनके बारे में जानकारी मिलती है। कुछ संभ्रांत लोग उनकी हवेली के स्थान पर बागी संग्राम सिंह मंच व स्तंभ बनवाया था। स्वतंत्रता दिवस पर माल्यार्पण करते थे। कई वर्षों से वह भी बंद हो गया है। उपजिलाधिकारी मोतीलाल यादव ने कहा कि क्षेत्रीय लोगों ने प्रशासन का ध्यान आकृष्ट नहीं कराया गया होगा, जिसकी वजह उनको नमन नहीं किया जाता है। कोशिश की जाएगी उन्हें श्रद्धांजलि दी जाए।
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