जौनपुर। साहित्यिक संस्था कोशिश की ओर से मतापुर स्थित मनीष विद्या मंदिर में काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें रचनाकारों ने अपनी कविताओं से गुदगुदाया और व्यवस्था पर तंज कसा।
शुरूआत जर्नादन अस्थाना के वंदना से की। अहमद निसार ने ‘हमने चेहरा बदल के देख लिया आओ अब आइना बदलते हैं’ सुनाकर खूब वाहवाही लूटी। अशोक मिश्र ने ‘ गरजती घोषणाएं हैं नहीं बरसा कभी मृदु जल’ गिरीश ने ‘मनुज की मनुजता में खामी न होती, अगर ये हवस की गुलामी न होती’, आकिल जौनपुरी ने ‘जो मजलूमों की करते थे सुरक्षा, वो घोड़ा बेच कर सोए हुए हैं’ से भावों की इंद्रधनुषी छटा बिखेरी। सभाजीत द्विेवेदी प्रखर ने कजली सुनाई। असीम नेे ‘खबर थी कि रंजो गम देगा, पर खबर क्या थी कि इतना कम देगा’, रामबचन ने ‘किसिम-किसिम के फूल से आपन सजल रहल फुलवारी’, जर्नादन ने ‘अभी हमने जी भरके निहारा नहीं है’गीत सुनाकर शृंगार रस की वर्षा की। डा. पीसी विश्वमर्का ने गिरते हुओं को बढ़के उठाना पड़ा मुझे को लोगों ने सराहा। गोष्ठी में दमयंती सिंह, राजेंद्र सिंह, रामजीत मिश्र, समीर, मोनिस जौनपुरी, आसिफ फर्रुखाबादी, सुशील दुबे, रुपेश कुमार, फूलचंद भारती मौजूद रहे। अध्यक्षता डा. पीसी विश्वकर्मा ने की। मुख्य अतिथि बीएचयू के प्रो. वशिष्ठ अनूप रहे। संचालन बीएचयू के प्रो. आएएन सिंह ने किया।