सिकरारा / जौनपुर। कभी सैकड़ों गांवों को अपने शीतल जल से सिंचित करने वाली सई की खास अहमियत थी। आज नदी की हालत चिंताजनक है। आज नदी में कहीं भी प्रवाह नहीं है। यह गोमती की सहायक नदी है। इसमें प्रवाह कम होने का सीधा संबंध जिले की प्रमुख नदी गोमती के स्वास्थ्य से है। सई नदी की बहाली के लिए शासन और प्रशासन जितना जिम्मेदार है, उससे कम उन गांवों के लोग नहीं जो इसके तट पर बसे हैं। नदी हरदोई जिले के एक ताल से निकलती है। जाहिर है कि इसका उत्स भी भूजल ही है। तेजी से घटते जलस्तर का स्तर सई की सेहत पर भी पड़ा है। नदी उन्नाव , लखनऊ, रायबरेली, प्रतापगढ़ जिले से होती हुई जौनपुर में दाखिल होती है और यहां सिरकोनी क्षेत्र के राजेपुर में गोमती से उसका संगम होता है। नदी की लंबाई करीब चार सौ किलोमीटर दूर है। संगम स्थल पर कार्तिक पूर्णिमा पर स्नान करने वालों की भीड़ उमड़ती थी और मेला लगता था। मेला अब भी लगता है लेकिन नदी में स्नान करने वालों की संख्या कम हो गई है। इंटर कालेज शाहपुर के प्रधानाचार्य सुधाकर उपाध्याय बताते हैं कि जिले के कई सौ गांवों के लिए यह नदी जीवन रेखा थी। इससे सिंचाई और पशु-पंछियों के पीने का पानी नदी से ही लेते थे। नदी तट पर करशूल नाथ मंदिर लंबोदर नाथ धाम जैसे मंदिर हैं। श्रावण और पुरुषोत्तम मास में स्नान करने के लिए भीड़ लगती थी लेकिन आज श्रद्धालु पानी की कमी को कोस रहे हैं। जल ग्रहण क्षेत्र में सिल्ट जमा होने के कारण नदी उथली हो गई है। ऐसे में वर्षा जल भी नहीं टिकता है। इन दिनों स्थिति ऐसे ही है कि लोग पैदल ही नदीं पार कर जा रहे हैं। जिला पंचायत अध्यक्ष राज बहादुर यादव का कहना है कि नदी को बचाने का प्रयास होना चाहिए।
नदी में ज्यादातर जगहों पर घुटने भर पानी है। तलवा भीगने की स्थिति है। नदी का जिक्र रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास ने भी किया है। कभी लोग इस नदी का पानी पीते थे लेकिन आज इसका पानी अचमन लायक नहीं रह गया है।