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साहित्यीक विमुखता से वैचारिक और नैतिक चिंतन में आई कमी

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जौनपुर। वर्तमान समय साहित्यिक चिंतन के लिए संक्रमण काल है। कविता, कहानी, निबंध, उपन्यास समग्र साहित्यिक संरचना का काम प्रिंट मीडिया पर आधारित था। लोग अपने खाली समय का उपयोग काव्य और शास्त्रों के अध्ययन में बिताते थे। आज उसका स्थान टीवी धारावाहिक ने ले लिया है। समाज का एक बड़ा हिस्सा साहित्य से दूर होता जा रहा है। इस कारण वैचारिक और नैतिक चिंतन में कमी आई है। विश्व पुस्तक दिवस की सार्थकता तभी साबित होगी जब लोगों का रुझान फिर से साहित्य की तरफ बढ़ेगा।
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साहित्यकार सभाजीत द्विवेदी प्रखर का कहना साहित्य के लिए पाठकीय संकट खड़ा हो गया है। व्यवसायीकरण के चलते लोग रोजी रोटी की तलाश में व्यस्त हो गए हैं। पहले के समय में लोग अपनी खाली समय का उपयोग काव्य और शास्त्रों को पढने में बिताते थे। बाजार वाद ने व्यक्ति के विचारों को व्यावसायिक स्वार्थों तक सीमित कर दिया है। पूर्वांचल विश्वविद्यालय के बिजनेस इकोनामिक्स के विभागाध्यक्ष प्रो. मानस पांडेय का कहना है कि पुस्तकें व्यक्तित्व का द्योतक होती हैं। छात्रों में पुस्तकों के प्रति घटती रुचि चिंता का विषय है जबकि पुस्तकें पठन पाठन का स्थाई तंत्र हैं। साहित्यिक जानकारी नहीं होने के कारण नैतिकता का तेजी से पतन हो रहा है। टीडी कालेज के प्राचार्य डा. विनोद कुमार सिंह का कहना है कि साहित्य हमेशा जमीन से जुड़ा होता है। साहित्यिक किताबों से हमें सामाजिक संरचना के साथ नैतिकता की सीख मिलती है। संकीर्णता आने पर साहित्य कमजोर हो जाता है। समाज में साहित्य के साथ ज्ञान की चर्चा होनी चाहिए। लेखकों की नैतिक जिम्मेदारी है कि वह पाठकों को अच्छी किताबें उपलब्ध कराएं। राजकीय पुस्तकालय के अध्यक्ष बृजेश कुमार पांडेय का कहना है कि पुस्तकालय में अध्ययन के लिए 19271 किताबें उपलब्ध हैं। हर वर्ष समसामयिक घटनाओं पर आधारित किताबें भी उपलब्ध कराई जाती हैं। वर्ष 2015 में जहां प्रतिदिन 25 से 30 लोग पुस्तकालय में आते थे जो वर्तमान में बढ़कर 50 से अधिक हो गई है। 546 लोग पुस्तकालय के आजीवन सदस्य हैं।
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