जौनपुर। गोमती नदी के तट पर बसा जौनपुर मध्यकालीन भारत में उत्तरी भारत का स्वतंत्र राज्य 1394-1479 के बीच था। जौनपुर सल्तनत के अंतर्गत यूपी आता था। जिस पर शर्की शासकों का साम्राज्य था। 14वीं शताब्दी में फिरोज तुलगक ने अपने चचेरे भाई सुल्तान मुहम्मद उर्फ जौना खां की याद में जिले का नाम 1394 में जौनपुर रखा। इस जिले में 157 साल में एफआईआर की संख्या एक हजार गुना बढ़ गया है। जिले में प्रथम एसपी के रूप में सितंबर 1947 में अब्दुल रऊफ की तैनाती हुई जो 30 जून 1948 तक रहे।
वैसे तो देश में 1860 में आईपीसी बनी। लेकिन 1861 में जिले में तीन एफआईआर दर्ज हुए। पहला एफआईआर क्या था। इसका विवरण पुलिस के पास नहीं है। 1878 में कोतवाली जौनपुर की स्थापना हुई। उस समय कोतवाली के अलावा और तहसील स्तर पर थाने खोले गए। जो अब बढ़कर 28 हो गई है। जौनपुर की कोतवाली एक छोटे से भवन में 1878 में संचालित थी। जो 1890 में एक भवन में स्थानांतरित हुई। इसके पहले उस भवन में अस्पताल संचालित होता था। वर्ष 1911 के बाद ही पुलिस रिकार्ड में केस का विवरण मौजूद है। इसके पूर्व के विवरण खोजे नहीं मिल रहे हैं। 1881 में बक्शा थाने का भवन बना। अंग्रेजों ने पुलिस लाइन और थानों के भवन बनवाए। अभी भी पुलिस अधीक्षक का आवास अपने निजी भवन में नहीं है। 1878 में जिले में दर्ज मुकदमों की संख्या करीब 20 के आसपास पहुंच गया। जो मार्च 2018 में बढ़कर एक साल में 3950 हो गया है। वैसे आइपीसी, सीआरपीसी, एनसीआर आदि को लेकर तकरीबन 12 हजार से अधिक मुकदमे एक साल में 28 थानों में दर्ज होते हैं। एसपी केके चौधरी का कहना है कि पुराने रिकार्ड में पहले केस का विवरण अभी नहीं मिल पा रहा है। वैसे शुरूआती दौर में मुकदमों की संख्या नहीं के बराबर थी। उन्होंने बताया कि 1878 में जौनपुर की कोतवाली अस्तित्व में आई अब पिछले एक वर्ष में 3950 आईपीसी के मामले 28 थानों में दर्ज हुए हैं।