बरईपार। होली मनाने का तौर तरीका भी बदलता रहा है। रंगों के पर्व होली की तैयारी पखवाड़े भर पूर्व से होली की हो शुरू हो जाती थी। आपसी प्रेम सद्भाव एवं सामाजिक उत्कर्ष का प्रतीक रंगों का पर्व होली पहले जैसी उत्साहपूर्वक अब नहीं मनाया जाता। सामाजिक समरसता का यह त्योहार अब फीका पड़ता जा रहा है। भागमभाग की जिंदगी अब फागुन के गीतों की महफिलें नहीं सज रही हैं। इससे पारंपरिक गीतों का लोप होता जा रहा है।
ढोलक झांझ मजीरा पर गाया जाने वाला फगुआ, चैता, चौपाल, बेलवरिया भी नहीं सुनाई पड़ती है। फूहड़ गीतों के आगे अब ऐसे गीत गायब होते जा रहे हैं। होलिका दहन और रंग गुलाल की परंपरा तो है लेकिन गीतों की परंपरा खत्म होती जा रही है। पुरनियों का कहना है की महीने भर पहले बसंत पंचमी पर होलिका गाड़ दी जाती थी। यह परंपरा अब भी कायम है लेकिन इसके सात ही गीत गवनई की शुरुआत हो जाती थी, जो गुजरे जमाने की बात हो गई है। एक तरफ होलिका पर रोजाना लकड़ी और उपले रखे जाते थे और दूसरी तरफ होली गीतों की तैयारी शुरू हो जाती थी। होरियारों की टोली में होलिका की लपट सबसे ऊंची रखने और गीतों में अव्वल रहने की होड़ लगी रहती थी। पखवारे भर पूर्व ही राधा-कृष्ण, राम की होली पर आधारित गीतों का गायन जोरों पर हो जाता था। युवकों की टोली घर-घर जाकर के ढोलक और झाल के साथ भावपूर्ण फागुनी गीत सुनाते थे। मगर अब कामकाज के दबाव में लोग एक साथ नहीं बैठ पा रहे हैं और गीतों की तैयारी नहीं हो रही है। ऐसे में गीत सुनाई भी नहीं दे रहे हैं।