थानागद्दी। महात्मा गांधी से प्रभावित होकर केराकत के पटइल गांव निवासी शिवमूर्ति सिंह स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। उन्होंने भूदान और खादी आंदोलन में हिस्सा लिया। आजादी मिलने के बाद पं. जवाहर लाल नेहरू के मंत्रिमंडल में शामिल होने के लिए उन्हें बुलाया या लेकिन उन्होंने मंत्री पद ठुकरा दिया। स्वतंत्रता सेनानी पेंशन भी नहीं ली। उन्होंने इस धनराशि को गरीबों के उत्थान खर्च करने का सुझाव भेज दिया। इसके अलावा अन्य सेनानियों ने अंग्रेजों के खिलाफ बगावत की जिन्हें कारावास की सजा हुई।
वर्ष 1910 में पटइल गांव में एक साधारण परिवार में शिवमूर्ति सिंह का जन्म हुआ था। शिवमूर्ति सिंह बीआरपी कालेज में पढ़ाई के दौरान महात्मा गांधी से प्रभावित होकर स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े थेष स्वाधीनता आंदोलन में कूद पड़े थे। धीरेंद्र मजूमदार के साथ उन्होंने खादी आंदोलन का संचालन किया। बाद में उनको उत्तर प्रदेश के साथ आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु की भी जिम्मेदारी दी गई थी। उन्नाव में बाबा अली मंजर एवं पं. सुंदर लाल के साथ उन्हें 1942 में जेल जाना पड़ा। इसी दौरान जवाहरलाल नेहरू और लालबहादुर शास्त्री से निकटता बढ़ी। तीन साल की सजा के बाद 1945 में छूटे तो फिर स्वदेशी ,भूदान आंदोलन एवं खादी मिशन में जुट गए। रतनूपुर में कस्तूरबा ट्रस्ट, शिक्षा केंद्र, कुष्ठ सेवा केंद्र के साथ सूत कातने का प्रशिक्षण देने, भूदान के प्रति तत्पर रहे। आंदोलन में उन्हें पत्नी भाग्यवनी का सहयोग मिलता था। 1975 में सरकार की गलत नीतियों का विरोध करने के कारण उनको दो साल जेल की सजा काटनी पड़ी जिसके चलते वे इकलौते बेटे विनोद की शादी में शामिल नहीं हो पाए। वह हिंदी, अंग्रेजी,फ़ारसी और उर्दू के ज्ञाता थे। 30 जून 1979 को उनका निधन हो गया।
केराकत क्षेत्र के ही बरइछ निवासी राजनारायण पांडेय, रामनारायण पांडेय तथा बलुआ के रामदेव पांडेय ने अंग्रेजों से बगावत की तो उन्हें एक वर्ष की सश्रम कारावास की सजा हुई और 25 रुपये जुर्माना भरना पड़ा। राजनारायण पांडेय की मौत जेल में ही हो गई थी। भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल रामनारायण 1943 में जेल से छूटे थे। इनके नाम का कोई स्मारक भी नहीं है। रामनारायण के छोटे पुत्र अधिवक्ता प्रदीप पांडेय बताते हैं कि उन्हें गर्व है कि वह स्वतंत्रता सेनानी के पुत्र हैं। वह चार भाई, एक बहन हैं लेकिन सेनानी के परिवार का होने का लाभ आज तक नहीं मिला। इसी प्रकार गोबरा के सूबेदार मिश्र ने छात्रजीवन में ही जौनपुर में तिरंगा लहराया और अंग्रेजों के विरुद्ध नारे लगाए। उन्हें जेल में डाल दिया गया। बाद में उन्होंने गाजीपुर में पढ़ाई की। राजकीय इंटर कालेज में गणित के प्रवक्ता रहते हुए उन्होंने कई किताबें लिखीं। राज्यपाल और राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त इस स्वतंत्रता सेनानी का निधन 2015 में हो गया।