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विलुप्त होती सांस्कृतिक परम्पराओं को जीवंत कर रहा संस्थान

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जौनपुर। फागुन आते ही मस्ती छा जाती है। दरख्त तक पत्ते बदलने लगते हैं। नई कोपलें निकलती हैं तो मन सहसा ही गाने लगता है। लोक संगीत फूट पड़ता है। लोक रंग में पगे फगुआ गीतों पर फूहड़ संगीत प्रभावी होता जा रहा है। बख्शा विकास खंड का श्री द्वारिकाधीश लोक संस्कृति एवं वानस्पतिकी विकास संस्थान पारपंरिक लोक धुन को सहेजने मं लगा है। संस्थान प्रतिवर्ष फागुन माह में लोक कलाकारों को मंच मुहैया कराता है। संस्थान के अध्यक्ष डा मनोज मिश्र का कहना है कि तीन दशक पहले तक जनपद की लोक गायकी बहुत समृद्ध रही है। समूचे जनपद में बसंत पंचमी से फागुनी गीतों पर ढोल की थाप से गांव गूंजने लगते थे। यह गूंज अनवरत चैत की अष्टमी तक चलती थीं। इन आयोजनों में सभी जाति धर्म के लोग एक साथ बैठकर फगुआ, चैता, उलारा, चैताल, बेलवईया, डेढ़ताल जैसे फागुनी गीतों का समूह में गान करते थे। अपने आने वाली पीढ़ी के समक्ष एक अनुकरणीय उदाहरण भी प्रस्तुत करते थे। लेकिन आज के भागम भाग दौर में लोग अपने तक ही सीमित हो गए है। परिणाम यह हुआ कि लोक संस्कृति में समूह गान जैसी बात विलुप्त हो गई। उन्होंने कहा कि संस्थान ने विलुप्त होती लोक-संगीत की इस संस्कृति को संजोने का बीड़ा उठाया है। संस्थान के प्रयास से जीवन के 70 बसंत पार कर चुके कई गायक इन गीतों को नई पीढ़ी के सामने प्रस्तुत कर उन्हें इसे सहेजने की सीख दे रहे हैं। लोक संगीत में फाग विधा की विलुप्त होती परम्परा को इस संस्थान ने स्व प्रयास से संरक्षित किया है । संस्थान के अध्यक्ष डॉ मनोज मिश्र ने बताया कि नब्बे के दशक से लोक संगीत के नाम पर फूहड़ गानों का वर्चस्व बढ़ता गया । अवधी व भोजपुरी गीतों के नाम पर समाज में अश्लीलता परोसी जा रही थी । ऐसे में सुरूचिपूर्ण संगीत को बढ़ावा देने के लिए संस्थान अपनी पूर्व की परम्परा को कायम रखते हुए इन गीतों को आने वाली पीढ़ी के सामने प्रस्तुत किया है। संस्था द्वारा प्रतिवर्ष जनपद के लोक गायकों को मंच मुहैया कर ऐसे आयोजनों,आयोजकों तथा लोक गायकों को सम्मानित करने का काम प्राम्भ किया। संस्था ने लोक-संगीत के सुरूचिपूर्ण संगीत कार्यक्रमों को सोशल मीडिया के जरिये वैश्विक स्तर पर भेजने का कार्य किया है। यू-टूयूब पर लोक संगीत कार्यक्रमों के कई वीडियो पोस्ट हैं। जिस पर सूरीनाम, मारिशस एवं वेस्टइंडीज से भी अप्रवासी भारतीयों ने भी समय समय पर इन गीतों के बारे में और विस्तृत जानकारी चाही है। इस प्रयास से परम्परागत गीतों को सुनने एवं सहेजने वाले लोगों की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि देखने को मिली है। इन गीतों में हमारे प्रकृति- समाज तथा पर्यावरण का चित्रण है। संस्थान का यह सतत प्रयास है कि यह लोक संगीत की यह परंपरा विलुप्त न होने पाए।
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