जोल्हूपुर। अवैध रूप से कमाए गए धन से व्यक्ति की बुद्धि भ्रमित हो जाती है। उसके पास विकारों के अलावा कुछ हाथ नहीं लगता है। शुक्रवार को श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन कथा वाचक राकेश द्विवेदी ने यह बात कही।
खैरई गांव में चल रही कथा में कहा कि एक बार राजा परीक्षित शिकार खेलने के लिए जंगल में गए, वहां प्यास से व्याकुल होकर अचानक समीर मुनि की कुटिया के पास पहुंच गए वहां पर समीर मुनि ध्यान मग्न थे उन्होंने न तो राजा की बात सुनी और न ही राजा को पानी दिया। इससे नाराज होकर पास में मृत पड़े एक सर्प को उठाकर उनके गले में डाल दिया।
मुनि पुत्र श्रंगी ऋषि ने राजा परीक्षित को सात दिन के अंदर नाग के काटने से मृत्यु का श्राप दिया। जब इसका पता राजा परीक्षित को हुआ तो उन्होंने श्रृषियों से परामर्श लेकर वह गंगा के किनारे तपस्या में लीन हो गए। अंत में नाग ने उनको काटा और उनकी मृत्यु हो गई।
इस दौरान परीक्षित श्रीप्रकाश, विश्ना देवी आयोजक रामबाबू सिंह, कृष्णा सिंह व राम लखन सिंह आदि मौजूद रहे।