मतदाताओं की चुप्पी ने राजनीतिक दलों के जानकारों को उलझा दिया है। चुनावी ऊंट किस करवट बैठेगा, मतदाताओं पर किसका जादू चलेगा, अभी तक प्रत्याशी और उनके चुनावी सिपहसालार इसका आकलन नहीं कर पा रहे हैं। बुधवार को दिन भर चाय की दुकानों में पर चुनाव की ही चर्चा होती रही। जातीय गणित के आधार पर हार-जीत का आकलन किया जाता रहा, लेकिन आखिर में सियासी विश्लेषक यही आकर अटक गए कि इस बार मतदाता कुछ बोल नहीं रहे। ऐसे में हार-जीत को लेकर कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी।
बीते एक पखवाड़े से नगर पंचायत क्षेत्र में प्रचार हुआ। राजनीतिक दलों के साथ निर्दलीय प्रत्याशियों ने खूब दमखम दिखाया। सबने अपने-अपने तरीके से मतदाताओं को रिझाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। घर-घर प्रत्याशी पहुंचे। किसी ने मतदाताओं के पैर पकड़े तो किसी ने हाथ जोड़े। किसी ने अपने चुनावी घोषणा पत्र का हवाला देकर वोट मांगे तो किसी ने राजनीतिक दल की विशेषताएं बताईं।
कॉल के जरिये भी प्रचार किया हुआ। स्टार प्रचारकों ने भी प्रत्याशियों को जिताने के लिए पूरी तरह जोर-आजमाइश की। कहीं रोड शो हुआ तो कहीं जुलूस निकाला गया। बुधवार की रात तक प्रत्याशियों ने दम नहीं लिया। वह हर तरीके से मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की कोशिश में जुटे रहे। इतने के बावजूद किस नगर पंचायत अध्यक्ष पद के लिए कौन प्रत्याशी हावी है और कौन कमजोर, इसका आकलन करना मुश्किल हो गया।
सभी प्रत्याशियों ने अपने-अपने किले की घेराबंदी कर रखी है और दूसरों के खेमों में सेंधमारी की कोशिश में रात भर जुटे रहे, लेकिन मतदाताओं की खमोशी ने उनकी बेचैनी बढ़ा रखी है। कोई भी प्रत्याशी या उनका समर्थक पुख्ता तौर पर यह दावा नहीं कर पा रहा कि कौन जीत रहा है।
देर रात तक वोटरों को रिझाया
मतदाताओं को रिझाने के लिए बुधवार की रात उम्मीदवारों के लिए अंतिम और भारी रही। प्रशासन की नजरों से बचते हुए उम्मीदवारों ने मतदाताओं को अपने पक्ष में लामबंद करने के लिए पूरी ताकत झोंक दी। निर्वाचन आयोग के निर्देश पर प्रचार भले ही मंगलवार की शाम से बंद हो गया, लेकिन प्रत्याशी और उनके समर्थक गुपचुप प्रचार में जुटे रहे।