संवाद न्यूज एजेंसी, हाथरस।
ब्रज की देहरी पर गणेश चतुर्थी का पर्व यहां भी धूमधाम से मनाया जाता है। यहां लोग घरों और मंदिरों में भगवान गणेश का पूजन करते हैं। पिछले एक दशक में यह उत्सव वृहद रूप ले चुका है। गणेश प्रतिमाओं के विसर्जन के दिन शहर व देहात में अलग-अलग स्थानों से धार्मिक जुलूस निकाले जाते हैं और प्रतिमाएं विसर्जित की जाती हैं।
ब्रज की देहरी में गणेश चतुर्थी का पर्व उत्साह के साथ मनाया जाता है, लेकिन पिछले करीब एक दशक से धूमधाम से यह पर्व महाराष्ट्र व कुछ अन्य राज्यों में मनाया जाता है। इस तर्ज पर अब यहां भी यह पर्व धूमधाम से मनाया जाने लगा है। पहले यहां के लोग केवल घरों तक ही गणेश चतुर्थी का पर्व मनाते थे, लेकिन अब यह गणेश उत्सव केवल घरोें तक सीमित नहीं रहा है।
यहां भी घरों व मोहल्लों में लोग गणेश प्रतिमाएं स्थापित कर उनकी पूजा-अर्चना की जाती है और फिर अनंत चतुर्दशी पर विसर्जन के दिन जुलूस निकालकर इन प्रतिमाओं को विसर्जित किया जाता है। यह प्रतिमाएं स्थापना के 10 दिन बाद विसर्जित की जाती हैं। गणेश उत्साह की काफी धूम रहती हैं।
और गणेश चतुर्थी पर चट्टा पूजन की परंपरा हो गई समाप्त
करीब ढाई दशक पहले तक शहर की पाठशालाओं में गणेश उत्सव को धूमधाम से मनाने का रिवाज था। इस दिन पाठशालाओं के विद्यार्थी पैदल मार्च निकालते थे और चट्टा पूजन करते थे, लेकिन समय के साथ यह परंपरा अब समाप्त हो गई है।
पाठशालाओं में इस दिन गुरु पूजन होता था और भगवान गणेश की पूजा-अर्चना की जाती थी। भगवान गणेश के जन्मदिन पर मनाए जाने वाले इस पर्व की तैयारी कई दिन पहले शुरू हो जाती थी। इसके लिए छात्र लकड़ी के डंडे तैयार करते थे। इस डंडे को चट्टा कहा जाता था। इसके नाम पर ही इस पर्व का नाम चट्टा चौथ पड़ गया। गुरुजनों की विद्यालयों में पूजा की जाती थी। उसके बाद चट्टा लेकर विद्यार्थी इसे बजाते हुए और चौपाई गाते हुए शहर में निकलते थे।
यह चौपाई उनके गुरुओं द्वारा रचित ही होती थी। चौपाई के माध्यम से कुरीतियों पर प्रहार किए जाते थे। सामाजिक समसरता का संदेश दिया जाता था। आजादी की जंग के समय अंग्रेजों के शासन पर भी इन चौपाइयों के माध्यम से प्रहार किया जाता था और लोगों को जागरूक किया जाता था। अब परंपरा बदल गई है। पुरानी पद्धति पर आधारित पाठशालाएं समाप्त हो गई हैं और इनका स्थान मांटेसरी स्कूलों ने ले लिया है। लिहाजा गणेश चौथ पर यह परंपरा समाप्त हो गई।
- गणेश चतुर्थी का पर्व पहले चट्टा चौथ के रूप में विद्यार्थियों में काफी लोकप्रिय था। यहां भी विद्यार्थी एकत्रित होते थे और चट्टा चौथ पर कदमताल मिलाते हुए पैदल मार्च करते थे। चौपाइयां गाते थे। यह राष्ट्रभक्ति की भावना से ओतप्रोत होती थी। इनके माध्यम से अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध जनचेतना लाने का प्रयास किया जाता था।
-ओमप्रकाश शर्मा
- हमारे विद्यालय में विद्यार्थी हर साल यह उत्सव मनाते थे, लेकिन पाठशालाएं ही अब समाप्त हो गई हैं। विद्यार्थी आते नहीं हैं तो परंपरा तो स्वत: ही समाप्त हो जाएगी। वैसे उस समय गणेश चतुर्थी का पाठशालाओं में काफी महत्व होता था। अब यहां लोग महाराष्ट्र की तरह पूजा करते हैं।
-रामजीवन दीक्षित, संचालक श्री रामकृष्ण पाठशाला
- जिस तरह पिछले एक दशक से महाराष्ट्र की तरह यहां गणेश उत्सव मनाया जाने लगा है, यह भूमंडलीकरण का असर है। यहां से महाराष्ट्र में लोग रोजगार के लिए जाते हैं। रिश्तेदारियां भी जुड़ी हैं। आवागमन बढ़ा है तो वहां की इस संस्कृति को भी यहां के लोगों ने अपना लिया है। यह अच्छी बात है।
-विद्यासागर विकल
- गणेश चतुर्थी का पर्व पहले यहां स्कूलों में चट्टा चौथ के रूप में मनाया जाता था। संस्कृत विद्यालय नाममात्र के रह गए हैं, इसलिए यहां यह परंपरा समाप्त हुई है। अब यहां महाराष्ट्र की तरह गणेश उत्सव मनाने का चलन बढ़ गया है। वहां से लोग यहां और यहां के लोग वहां आने-जाने लगे हैं।
- जितेंद्र स्वरूप शर्मा