भगवान श्रीराम को लेकर देशभर में देश के कवियों ने हजारों कविताएं व गीत गाए हैं, लेकिन सर्वाधिक प्रसिद्ध कालजयी रचना हाथरस के निर्भय हाथरसी की थी। उनकी इस कविता ने राम मंदिर की मांग को आंदोलन बनाने में अहम भूमिका निभाई।
निर्भय हाथरसी से प्रभावित रहे कवि अनिल बौहरे बताते हैं कि वर्ष 1990 के बाद अयोध्या में रामजी को तंबू मे देखकर निर्भय जी ने पर्व भी मनेगा, तो मनेगा धूमधाम से, तंबू भी लगेगा तो लगेगा धूमधाम से, बंबू भी लगेगा तो लगेगा धूमधाम से, युध्द जो ठनेगा तो ठनेगा धूमधाम से, हिंदू जो करेगा वो करेगा धूमधाम से, राम जी का मंदिर बनेगा धूमधाम से, का सृजन किया था।
ये राम मंदिर पर विश्व की सर्वश्रेष्ठ रचना के रूप में सामने आई। इसे हाथरस के निर्भय जी की निर्भय रचना कहा गया। उसी समय फिरोजाबाद के कवि प्रो. ओमपाल सिंह निडर की रचना- सौगंध राम की खाते हैं, मंदिर वहीं बनाएंगे, रामलला हम आएंगे, काफी प्रसिद्ध हुई। अनिल बौहरे बताते हैं कि उस समय उनका कार्यक्षेत्र चेन्नई था, जहां उन्होंने राम मंदिर को लेकर- रामेश्वर पूजा कर, बजा राम का डंका, हनुमान ने जला डाली सोने की लंका, अयोध्या हमको फिर से सजाना होगा, तंबू में राम हमारे, मंदिर बनाना होगा, जनमानस को पसंद आई।
बताया कि आज राष्ट्रीय कवि संगम के बैनर तले और व्यक्तिगत तौर पर हजारों कवि राम और राम मंदिर पर काव्य लेखन में सक्रिय हैं। उन्होंने राम नाम चेतना, जन-जन है जगाया, राम का काम मर्यादा में राम की माया, पंक्ति के साथ मंगलवार को निर्भय हाथरसी को लेकर अपने स्मरण को विराम दिया।