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राजा महेंद्र प्रताप: राजसी ठाट छोड़कर लड़ी आजादी की लड़ाई, अफगानिस्तान में बनाई हिंद सरकार, बने थे राष्ट्रपति

Sun, 13 Aug 2023 02:52 AM IST
चमन शर्मा रवि शर्मा, अमर उजाला, हाथरस

सार

राजा महेंद्र प्रताप का जन्म एक दिसंबर 1886 में मुरसान के राजा घनश्याम सिंह के यहां हुआ था। वह उनकी तीसरी संतान थे। उनको हाथरस के राजा हरनारायण सिंह ने बतौर दत्तक पुत्र गोद लिया। उनकी प्रारंभिक शिक्षा हाथरस में ही हुई और आगे की पढ़ाई के लिए वह अलीगढ़ पहुंचे।
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राजा महेंद्र प्रताप सिंह - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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बात स्वतंत्रता आंदोलन की चल रही हो और मुरसान नरेश राजा महेंद्र प्रताप का जिक्र न हो, ऐसा कैसे हो सकता है। राजा महेंद्र प्रताप ने अपने जीवन के कई कीमती वर्ष विदेशों में रहकर देश की आजादी का माहौल बनाने में बिता दिए। अफगानिस्तान में उन्होंने हिंद सरकार की स्थापना की और इसके पहले राष्ट्रपति बने। 

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राजा महेंद्र प्रताप का जन्म एक दिसंबर 1886 में मुरसान के राजा घनश्याम सिंह के यहां हुआ था। वह उनकी तीसरी संतान थे। उनको हाथरस के राजा हरनारायण सिंह ने बतौर दत्तक पुत्र गोद लिया। उनकी प्रारंभिक शिक्षा हाथरस में ही हुई और आगे की पढ़ाई के लिए वह अलीगढ़ पहुंचे। अलीगढ़ से ही उन्होंने हाईस्कूल पास किया। इसके बाद बीए की प्रथम वर्ष की शिक्षा मोहम्मदन ओरिएंटल कॉलेज में प्राप्त की, लेकिन देश की आजादी की जंग के चलते आगे की पढ़ाई नहीं कर सके। वर्ष 1902 में उनका विवाह महाराजा जींद की छोटी बहन बलवीर कौर से हुआ। इसके बाद वह देश की आजादी के लिए लड़ी जा रही जंग में कूद पड़े।

1906 में कांग्रेस के कोलकाता सम्मेलन में वह शामिल हुए। स्वदेशी पहने एवं उसे अपनाने का नारा सर्वप्रथम राजा महेंद्रप्रताप ने ही दिया था। उनके आह्वान पर कोलकाता में विदेशी वस्तुओं की होली जलाई गई और स्वदेशी स्वाधीनता की शपथ ली गई। 1914 में राजा महेंद्रप्रताप सिंह ने देहरादून में राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन से मुलाकात की और विदेशों में रहकर देश की आजादी की जमीन तैयार करने निश्चय किया। 
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इसी वर्ष 17 अगस्त को वह अपनी रानी को रोते-बिलखते छोड़कर चल दिए। रानी ने जब पूछा कि अब कब मिलोगे तो उत्तर था कि जब अफगान सेनाएं साथ होंगी। वह बिना पासपोर्ट के ही इटालियन जहाज से लंदन के लिए रवाना हो गए। वहां से स्विट्जरलैंड और इटली होते हुए जर्मनी पहुंचे। वहां पर उनकी मुलाकात कैसर से हुई। यहां अन्य देशभक्तों से मुलाकात के बाद वह दो अक्तूबर, 1915 को अफगानिस्तान पहुंच गए। वहां के बादशाह ने उनका शाही मेहमान के रूप में स्वागत किया।

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1916 के प्रारंभ में ही राजा महेंद्रप्रताप ने काबुल में ‘प्रोवीजन गवर्नमेंट ऑफ इंडिया’ (आजाद हिंद सरकार) की स्थापना की और प्रथम राष्ट्रपति बने। उन्होंने छह हजार अफगान सैनिकों की एक सेना को संगठित कर अंग्रेजी सरकार पर आक्रमण किया। इसमें भले ही वह पूरी तरह से सफल नहीं रहे, लेकिन अंग्रेजों की जमीन को हिलाकर रख दी। इसके बाद वह अफगानिस्तान से जापान गए। वहां भी उन्होंने पुनः ‘आजाद हिंद सेना’ की स्थापना की और जापन से मिलकर अंग्रेजों पर आक्रमण किए, लेकिन पूर्ण सफलता नहीं मिली। 

अंग्रेजों ने किया था राजा महेंद्रप्रताप को राजद्रोही घोषित
राजा महेंद्रप्रताप सिंह की क्रांतकारी गतिविधियों से थर्राए अंग्रेजों ने उनको परेशान करने के लिए वर्ष 1923 की वायसराय कौंसिल में अंग्रेजी सरकार की ओर से राजा महेंद्रप्रताप सिंह को बागी व राजद्रोही घोषित कर दिया। इसके चलते उनकी देहरादून, मुरसान और अलीगढ़ की संपत्ति को जब्त कर लिया। इतना होने के बावजूद राजा महेंद्रप्रताप ने हार नहीं मानी और अंग्रेजों से लोहा लेते रहे। राजा साहब एक बार पुनः जर्मनी गए। जहां से तुर्की और फिर बगदाद होते हुए अफगानिस्तान पहुंचे। इसके बाद रोम्यां में रोली से मिले। सोवियत रूस जाकर क्रेमिलिन में लेनिन से मिले। वह लगातार विदेशियों से सहयोग कर अंग्रेजी सरकार को भगाने में लगे रहे। इधर, 1925 में उनकी पत्नी का देहांत हो गया।

पं.नेहरू ने राजा साहब से मुलाकात को माना था सौभाग्य
वर्ष 1926 में जेनेवा की यात्रा के वक्त राजा महेंद्रप्रताप से पं. जवाहरलाल नेहरू ने मुलाकात की। पंडित जी ने अपनी किताब ‘मेरी कहानी’ में लिखा है कि ‘जेनेवा में राजा महेंद्रप्रताप से मिलने का अवसर प्राप्त हुआ। उनको देखते ही में भारी आश्चर्य में पड़ गया था। वह विदेशों में घूम कर देश की आजादी के लिए प्रयास कर रहे थे। उनकी पोशाक बड़ी विचित्र थी। वह सन 1957 से 1962 तक संसद सदस्य भी रहे। राजा महेंद्रप्रताप 1946-47 में स्वदेश लौटे। वह सन 1957 से 1962 तक संसद सदस्य भी रहे। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के साथ अन्य कई विद्यालयों के लिए अपनी जमीन दान में दी थी। त्रासदी यह है कि जमीन दान देने के बाद भी किसी विद्यालय में उनके नाम का कोई शिलालेख नहीं है। 29 अप्रैल 1979 को देश का यह महान सपूत चिरनिद्रा में सो गया।
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