1916 के प्रारंभ में ही राजा महेंद्रप्रताप ने काबुल में ‘प्रोवीजन गवर्नमेंट ऑफ इंडिया’ (आजाद हिंद सरकार) की स्थापना की और प्रथम राष्ट्रपति बने। उन्होंने छह हजार अफगान सैनिकों की एक सेना को संगठित कर अंग्रेजी सरकार पर आक्रमण किया। इसमें भले ही वह पूरी तरह से सफल नहीं रहे, लेकिन अंग्रेजों की जमीन को हिलाकर रख दी। इसके बाद वह अफगानिस्तान से जापान गए। वहां भी उन्होंने पुनः ‘आजाद हिंद सेना’ की स्थापना की और जापन से मिलकर अंग्रेजों पर आक्रमण किए, लेकिन पूर्ण सफलता नहीं मिली।
अंग्रेजों ने किया था राजा महेंद्रप्रताप को राजद्रोही घोषित
राजा महेंद्रप्रताप सिंह की क्रांतकारी गतिविधियों से थर्राए अंग्रेजों ने उनको परेशान करने के लिए वर्ष 1923 की वायसराय कौंसिल में अंग्रेजी सरकार की ओर से राजा महेंद्रप्रताप सिंह को बागी व राजद्रोही घोषित कर दिया। इसके चलते उनकी देहरादून, मुरसान और अलीगढ़ की संपत्ति को जब्त कर लिया। इतना होने के बावजूद राजा महेंद्रप्रताप ने हार नहीं मानी और अंग्रेजों से लोहा लेते रहे। राजा साहब एक बार पुनः जर्मनी गए। जहां से तुर्की और फिर बगदाद होते हुए अफगानिस्तान पहुंचे। इसके बाद रोम्यां में रोली से मिले। सोवियत रूस जाकर क्रेमिलिन में लेनिन से मिले। वह लगातार विदेशियों से सहयोग कर अंग्रेजी सरकार को भगाने में लगे रहे। इधर, 1925 में उनकी पत्नी का देहांत हो गया।
पं.नेहरू ने राजा साहब से मुलाकात को माना था सौभाग्य
वर्ष 1926 में जेनेवा की यात्रा के वक्त राजा महेंद्रप्रताप से पं. जवाहरलाल नेहरू ने मुलाकात की। पंडित जी ने अपनी किताब ‘मेरी कहानी’ में लिखा है कि ‘जेनेवा में राजा महेंद्रप्रताप से मिलने का अवसर प्राप्त हुआ। उनको देखते ही में भारी आश्चर्य में पड़ गया था। वह विदेशों में घूम कर देश की आजादी के लिए प्रयास कर रहे थे। उनकी पोशाक बड़ी विचित्र थी। वह सन 1957 से 1962 तक संसद सदस्य भी रहे। राजा महेंद्रप्रताप 1946-47 में स्वदेश लौटे। वह सन 1957 से 1962 तक संसद सदस्य भी रहे। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के साथ अन्य कई विद्यालयों के लिए अपनी जमीन दान में दी थी। त्रासदी यह है कि जमीन दान देने के बाद भी किसी विद्यालय में उनके नाम का कोई शिलालेख नहीं है। 29 अप्रैल 1979 को देश का यह महान सपूत चिरनिद्रा में सो गया।