फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

हाथरस : पूरे साल जिले की सियासत में मची रही उथल-पुथल

विज्ञापन
विज्ञापन
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हाथरस
विज्ञापन

पूरे साल जिले की सियासत में उथल-पुथल मची रही। साल के पहले तीन महीनों में विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मियां चरम पर रहीं तो साल के अंत में राजनेता निकाय चुनाव की तैयारी में जुटे रहे। इस साल हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा की स्थिति जस की तस रही तो रालोद फायदे में रहा। बसपा को नुकसान उठाना पड़ा। सपा का प्रदर्शन पहले से बेहतर रहा। कांग्रेस भी हाशिए पर रही। कई राजनेताओं ने चुनाव में दलबदल भी किया।
प्रदेश के साथ जिले की सियासत के लिए भी यह साल बेहद अहम रहा। इसकी वजह यह रही कि इस साल प्रदेश में विधानसभा चुनाव हुए। जिले की सियासत में भाजपा पूरा जोर लगाकर भी इस साल हुए विधानसभा चुनाव में सादाबाद की सीट नहीं जीत पाई। उसने प्रदेश के कद्दावर नेता रामवीर उपाध्याय को भी अपनी पार्टी में शामिल कराया, लेकिन स्थिति जस की तस ही रही।
विज्ञापन

भाजपा ने इस बार भी हाथरस और सिकंदराराऊ सीट पर विजय हासिल की। हाथरस सीट पर अंजुला माहौर ने एक लाख से ज्यादा वोटों से जीत हासिल कर रिकॉर्ड बनाया। वैसे इस बार रालोद फायदे में रहा। रालोद ने इस बार विधानसभा चुनाव में सादाबाद सीट से जीत हासिल की। रालोद प्रत्याशी प्रदीप कुमार उर्फ गुड्डू चौधरी वहां से भाजपा को हराकर चुनाव जीते। सिकंदराराऊ से दूसरी बार वीरेंद्र सिंह राना ने चुनाव जीता।
बात यदि सपा की करें तो सपा पिछले चुनावोें की तरह इस बार भी खाली हाथ रही, लेकिन अन्य चुनावों की अपेक्षा उसका प्रदर्शन इस बार बेहतर रहा। सपा की सहयोगी पार्टी रालोद ने जहां सादाबाद में जीत हासिल की तो सिकंदराराऊ में उसके प्रत्याशी ललित प्रताप का प्रदर्शन भी बेहतर रहा। वह 10 हजार से कम वोटों से अंतर से ही चुनाव हारे। बसपा की स्थिति इस साल विधानसभा चुनाव में कमजोर रही।
बसपा को जिले में कोई सीट नहीं मिली। और तो और तीनों में से किसी भी सीट पर वह दूसरे स्थान पर भी नहीं रही। कांग्रेस लंबे समय से चल रहा जिले में अपना सूखा नहीं खत्म कर पाई। जिला पंचायत सदस्य के लिए उपचुनाव में भी रालोद ने जीत हासिल की। इस साल भी कई नेताओं ने पाले बदले। पूर्व मंत्री रामवीर उपाध्याय ने भाजपा का दामन थामा। मुरसान नगर पंचायत के अध्यक्ष रजनीश कुशवाहा सहित कई अन्य नेता भी भाजपा में शामिल हुए। वहीं राजनेताओं के चुनावी दौरे भी इस साल जमकर हुए।
विभिन्न दलों में अंदरूनी कलह खुलकर भी आई सामने
कई राजनीतिक दल पूरे साल अंदरूनी कलह से भी जूझे और इनकी कलह खुलकर सामने भी आई। विधानसभा चुनाव सपा में कई सपा नेता टिकट न मिलने पर खुलकर पार्टी के खिलाफ बोले। यही स्थिति भाजपा में रही और सदर सीट से अंजुला माहौर को जब प्रत्याशी बनाया गया तो उनके खिलाफ जुलूस तक निकाले गए। कई वरिष्ठ नेता खुलकर विरोध में आ गए। वहीं नगर पालिका हाथरस में नगर पालिका के सभासद ही अपनी पाटी के चेयरमैन आशीष शर्मा के खिलाफ डेढ़ माह तक धरना-प्रदर्शन करते रहे और गंभीर आरोप लगाते रहे।
साल के अंत में आरक्षण को लेकर जुटे रहे तैयारी में
साल के अंत में निकाय चुनाव की तैयारी में राजनेता जुट रहे। हर किसी की नजर अंतिम आरक्षण पर रही। अपने-अपने हिसाब से राजनेता आरक्षण का इंतजार करते रहे। अनंतिम आरक्षण और फिर न्यायालय के फैसले ने कई राजनेताओं के अरमानों पर भी पानी फेर दिया। नगर पालिका व पंचायतों के अध्यक्ष और वार्डों के चुनाव को लेकर दावेदारों ने प्रचार शुरू कर दिया। भाजपा में सबसे ज्यादा दावेदार सामने आए। संवाद
विज्ञापन

इस साल हुआ पूर्व मंत्री रामवीर का निधन
हाथरस। इस साल जिले के एक कद्दावर नेता रामवीर उपाध्याय का निधन भी हुआ। जिले के इस राजनेता का दो सितंबर को आगरा में लंबी बीमारी के उपरांत निधन हो गया। उन्हें श्रद्धांजलि देने वालों का यहां कई दिन तक तांता लगा रहा और काफी राजनेता भी इसमें शामिल रहे। संवाद
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें