फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

हाथरस : गांव-गांव जाकर लोगों को करते प्रेरित, तीन बार जेल जाने के बाद भी नहीं बदला इरादा

विज्ञापन
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पं. आनंदीलाल का फाइल फोटो। - फोटो : SHAPHU
विज्ञापन
मुुुकेश बाबू शर्मा, सहपऊ।
विज्ञापन

कस्बा के सबसे पुराने एवं प्रमुख स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडित आनंदी लाल गांधीजी से प्रेरित होकर स्वतंत्रता आंदोलन में कूदे थे। वे गांव-गांव जाकर लोगों को आजादी की लड़ाई के लिए प्रेरित करते थे। तीन बार जेल भी गए। कई बार अर्थदंड झेला उसके बावजूद उनका हौसला नहीं डिगा। अंग्रेजों के अत्याचार के बावजूद उन्होंने अपना इरादा नहीं बदला और देश को आजाद कराने में लगे रहे।
उनके पौत्र सत्यम गौड़ ने बताया कि पंडित जी ने शादी नहीं की थी। उनके पिता के दो संतानें थी। पंडित होने के नाते सभी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी उनकी बात मानते थे और उनका ही अनुसरण करते है। उनकी आंदोलन में भाग लेने एवं अंग्रेजों के प्रति विरोध करने के लिए बनाई जाने वाली रूपरेखा एवं उसके लिए बैठक करने के स्थान का चयन पंडित जी ही करते थे।
विज्ञापन

वह बैठक करने का स्थान बदलते रहते थे जिससे प्रशासन एवं पुलिस को इन कार्यक्रमों की भनक नहीं लगती थी। वह पुराने समय के कथा वाचक एवं क्षेत्र के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य थे। उनके द्वारा की गई अधिकांश: भविष्यवाणियां सही होती थी। गांधी जी से प्रभावित होकर वह देश के लिए हो रहे स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े और गांव-गांव जाकर लोगों को अंग्रेजों के खिलाफ प्रेरित करते थे।
उन्होंने लोगों को कहा था कि देश अवश्य ही स्वतंत्र होकर रहेगा। उनकी बातों पर विश्वास करने के कारण ही कस्बे के 22 एवं क्षेेत्र के 20 लोग देश के स्वतंत्र कराने वाले आंदोलन से जुड़ गए। कुछ ऐसे भी परिवार है कि उन्होंने देश को स्वतंत्र कराने में अपना योगदान दिया लेकिन अभिलेखों में उनका नाम नहीं होने के कारण उनको स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का दर्जा प्राप्त नहीं हो सका।
नमक सत्याग्रह में भाग लेने के लिए हुआ तीन महीने का जेल
पंडितजी को सर्वप्रथम सन 1930 में नमक सत्याग्रह एवं विदेशी वस्तु बहिष्कार आंदोलन में भाग लेने पर तीन माह की जेल एवं दस रुपये का जुर्माना हुआ। 1931 में छह मास का कारावास का दंड एवं 50 रुपये जुर्माने की सजा मिली। इसके बाद व्यक्तिगत सत्याग्रह आंदोलन में भाग लेने पर 1941 में एक वर्ष की जेल तथा तीस रुपये जुर्माना की सजा हुई।
विज्ञापन

तीन बार जेल जाने के बाद भी पंडितजी ने लोगों को अंग्रेजों के विरुद्ध एकजुट किया। अंत में देश आजाद हो गया। 1972 में पूर्व प्रधानमंत्री ने उनके पैर छूकर आशीर्वाद लिया तथा ताम्रपत्र भेंट किया। पंडित जी के परिवार को सरकार की तरफ से कोई सुविधा नहीं मिली वह आजतक पंडिताई कर अपना जीवनयापन कर रहा है। उनके पौत्र का कहना है कि उनके पिता स्व. पप्पू पंडितजी को उन्होंने गोद लिया था। देश के आजाद होने के बाद भी वह समाज के कल्याण के लिए कार्य करते रहे। संवाद
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें