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हाथरस : सर्कस कलाकारों के तारे गर्दिश में...पता नहीं कब इस खेल से पर्दा उठ जाए

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हाथरस : मेला श्रीदाऊजी महाराज में लगा जिम्मी सर्कस। संवाद - फोटो : HATHRAS
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गौरव भारद्वाज
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हाथरस। श्रीदाऊजी मंदिर के परिसर में जिम्मी सर्कस चल रहा है। अपनी ओर से इसके कलाकार अपने करतबों से दर्शकों का दिल जीतने की कोशिशों में जुटे हैं। कोई हवा में करतब दिखा रहा है तो कोई जोकर बनकर दर्शकों को रिझाने में लगा है। आम जन की रुचि कम है। भीड़ जरा कम ही जुट रही है। सर्कस के कलाकारों के मन में मायूसी है। आशंकाएं घेरती हैं। पता नहीं कब इस समूचे खेल से पर्दा उठ जाए।
संचालक रहीश का कहना है कि जब से सर्कस में जानवरों को प्रतिबंधित किया गया है। दर्शकों भी कम जुटते हैं। सर्कस के संचालक रहीशबताते हैं कि उनके परिवार में 15 से 20 लोग हैं। पूरा परिवार सर्कस के जरिये ही अपनी रोजी-रोटी चला रहा है। इस बार धंधा मंदा है। हो सकता है कि आने वाले दिनों में सर्कस देखने को भी न मिले। संवाद
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सर्कस के पंडाल में कैद होकर रह गई जिंदगी
सर्कस में हवा में करतब दिखाने वाली बिट्टो ने बताया कि वह मेले में पैदा हुई थी। सबसे पहले एटा में लगे सर्कस में उसने हवा में करतब दिखाया। तब उसे डर लगा था। अब यह उसकी आदत में शामिल हो गया है। अब सर्कस के पंडाल में जिंदगी कैद हो गई है।
खेल बन गई है काजल की जिंदगी
सर्कस संचालक के परिवार की काजल का कहना है कि वह सर्कस में शूटिंग और डॉगी नंबर के साथ खेल दिखा रही है, इसलिए उसकी जिंदगी खेल बन गई है। अन्य परिजन भी तरह तरह के करतब दिखा रहे हैं।
कद छोटा लेकिन हंसाने का बड़ा काम कर रहे विजय
छोटे कद होने के कारण विजय को कहीं नौकरी नहीं मिली, इसलिए उसने जीवन यापन के लिए सर्कस को चुना। इन-दिनों वह मेले में लगे सर्कस में लोगों को हंसाने का काम कर रहे हैं। दुनिया को हंसाते-हंसाते इनकी खुद की जिंदगी भी खिलखिलाने लगी है।
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गुड्डू पहले मैकेनिक थे, अब मौत के कुएं में दिखा रहे करतब
हाथरस। मौत के कुएं में बाइक चलाने वाले गुड्डू ने बताया कि वह पहले मैकेनिक का काम करते थे। इस दौरान उनकी दुकान पर मौत का कुआं वाला साइकिल का पंक्चर जुड़वाने आया। पहले जमीन में गड्ढा खोदकर साइकिल चलाई जाती थीं। बाद में बाइक आईं। 13 साल की उम्र में साइकिल चलाना शुरू किया। उसके बाद बुलेट, जेम बाइक, बेस बौंड, राजदूत, सुजूकी और अब यामहा की बाइक चला रहे हैं। करीब 40 साल से मौत के कुएं में काम कर रहे हैं। उनको 500 रुपये रोज मिलते हैं। उनका कहना है कि अब मौत का कुआं ही जिंदगी का हमसफर बन गया है। मौत का कुआं के संचालक वशीर का कहना है कि वह 20 साल से मौत का कुआं लगा रहे हैं। मेला श्रीदाऊजी महाराज में पहली बार आए हैं। मेले में उम्मीद के मुताबिक दर्शक नहीं हैं। संवाद
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