बेसिक शिक्षा विभाग के अनुसार परिषदीय इन दिनों स्कूलों में करीब 35 से 40 फीसदी बच्चे गैरहाजिर चल रहे हैं। इनमें स्कूलों नहीं आने में बड़ी तादात छात्राओं की है। जब इनके बारे में जानकारी की गई तो पता चला कि ये बच्चे आलू की खोदाई में लगे हुए हैं। इसमें किसानों के बच्चे भी शामिल हैं।
200 से 250 रुपये में मजदूरी
आलू खोदाई बौर बिनाई के लिए किसानों को जहां वयस्क मजूदर 300 से 400 रुपये दिहाड़ी पर मिलते हैं, वहीं स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे मात्र 200 से 250 रुपये में दिनभर खेतों में काम करने को तैयार हो जाते हैं। बड़े फर्म स्वामी बच्चों को ट्रैक्टर-ट्रॉली से खेत पर ले जाते हैं। ये बच्चे सुबह आठ बजे से शाम छह बजे तक खेत में काम करते हैं।
ट्रॉली से गिरकर छात्रा की हो चुकी मौत
सादाबाद में एक मार्च को एक छात्रा ट्रैक्टर-ट्रॉली पर सवार होकर आलू खोदाई के लिए जा रही थी। आगरा रोड पर कुरसंडा मोड़ के निकट ट्रैक्टर-ट्रॉली स्पीड ब्रेकर के ऊपर उछल गई थी। इससे ट्रॉली मेंं बैठी नसरीन सिर के बल सड़क पर जा गिरी थी और उसकी उपचार के दौरान उसी दिन मौत हो गई थी।
लागत से कम मिल रहा दाम
जिले में कुल 161 शीतगृह हैं, जिनमें से 150 शीतगृह संचालित हैं, जिनमें 12 लाख 63 हजार मीट्रिक टन फसल भंडारण की क्षमता है। शीतगृह संचालकों ने 10 रुपये प्रति पैकेट के हिसाब से किराया बढ़ा दिया है। किसानों के मुताबिक फसल बोने से लेकर खोदाई और शीतगृह में भंडारण लागत ही करीब 500 रुपये प्रति क्विंटल आ रही है। मंडी में लागत के बराबर सी ही कीमत यानी करीब 550 रुपये प्रति क्विंटल आलू के दाम मिल रहे हैं। वहीं सरकार भी आलू को 600 रुपए प्रति कुंतल की दर से खरीदने की बात कह रही है।
घर-घर बच्चों को तलाश रहे शिक्षक
परिषदीय स्कूलों में पढ़ने वाले कक्षा चार से कक्षा आठवीं तक के कुछ छात्र मजदूरी पर खेतों में आलू बीन रहे हैं या फिर अपने परिवार के लोगों का सहयोग करने में लगे हैं। शिक्षकों ने बताया कि वह गांव में बच्चों को स्कूल लाने के लिए घर-घर जा रहे हैं, लेकिन उनके अभिभावक ही बच्चों को स्कूल नहीं भेज रहे। अभिभावक कहते हैं कि बच्चा खेत में आलू बीनने के लिए गया है। आप यहां क्यों आए हैं?