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दलित हत्याकांडः मायावती ने रुदायन में दिया था धरना

Wed, 15 Feb 2017 11:38 PM IST
ब्यूूूराे, अमर उजाला, हाथ्ारस
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मायावती - फोटो : amar ujala
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सासनी (हाथरस)। 11 मार्च 1990 को गांव रुदायन में दलित बस्ती पर हमले और एक दलित को जिंदा जला देने के बहुचर्चित मामले में अदालत के फैसले के बाद गांव में सरगर्मियां एकाएक तेज हो गईं। पीड़ित पक्ष के घर जहां खुशी का माहौल है वहीं अभियुक्त पक्ष के घरों पर सन्नाटा पसरा है।
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इस फैसले के बाद गांव रुदायन एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। गौर हो कि 27 साल पहले खेली गई इस खून की होली के बाद देशभर में सियासी भूचाल आ गया था। बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी डीएसफोर (दलित-शोषित समाज संघर्ष समिति) के बैनर तले गांव में धरना दिया था।

वर्ष 1990 में होली रखने को लेकर गांव के दो पक्षों के बीच विवाद हुआ था, जिसने होली वाले दिन उग्र रूप धारण कर लिया था। इस मामले में दाताराम नाम के व्यक्ति को जिंदा जला दिया गया था। करीब 40 मकान जला दिए गए थे। गांव में जमकर बवाल हुआ था। उस समय सासनी अलीगढ़ जिले का हिस्सा थी। इस घटना ने अलीगढ़ जिला प्रशासन को हिलाकर रख दिया था।
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घटनाक्रम को लेकर जमकर राजनीति हुई थी। डीएसफोर के बैनर तले मंडल भर के दलित नेताओं के साथ बसपा सुप्रीमो मायावती ने कई दिन धरना-प्रदर्शन किया था। कई महीनों तक ग्राम रुदायन सियासी सुर्खियों में रहा था। डीएसफोर के धरने के विरोध में सवर्ण समाज की ओर से जनता दल, भाजपा, कांग्रेस और राष्ट्रीय लोकदल के नेताओं ने ग्राम समामई पर मंच से हुंकार भरी थी। बुधवार को अपर सत्र न्यायाधीश तृतीय की अदालत ने बुधवार को इस बहुचर्चित मामले में निर्णय सुनाया।

यह न्याय की जीत है
मुकदमे के वादी 72 वर्षीय हरीशंकर कहते हैं कि  1990 में गांव में होली वाले दिन हुए मेरे भाई दाताराम को जिंदा जला दिया गया था। दलितों के करीब 40 घर जला दिए गए थे। घटना का सामूहिक मुकदमा मैंने दर्ज कराया था। आज अदालत ने जो निर्णय सुनाया है, वह सही है। यह न्याय की जीत है। बाकी दोषियों को भी सजा मिलनी ही चाहिए।  

अदालत का निर्णय सही
पीड़ित पक्ष के चोखेलाल कहते हैं कि गांव में पूर्वजों के समय से जहां होली रखी जाती थी, उस जगह पर विरोधी पक्ष के लोग मंदिर बनाना चाहते थे। होली के लिए गांव से दूर स्थान बनाना चाहते थे। इसी बात पर विवाद हुआ था, जिसमें भारी नुकसान हुआ था। अदालत का निर्णय एकदम सही है।

आरोपी पक्ष के यहां पसरा सन्नाटा
आरोपी सजा सुनाने से पहले ही अदालत में हाजिर हो गए थे। सजा पर सुनवाई से पहले ही उन्हें कस्टडी में ले लिया गया था। परिजन उनकी जमानत के लिए गए थे। इस कारण घरों के दरवाजे बंद थे। अदालत के फैसले की जानकारी मिलने के बाद उनके मोहल्ले में सन्नाटा पसरा हुआ था। कोई बात करने वाला भी नहीं मिला।

लंबे समय बाद मृत्युदंड की सजा
जिला न्यायालय से लंबे समय बाद किसी मामले में मृत्युदंड की सजा सुनाई गई है। लिहाजा यह मामला न्यायालय परिसर में भी चर्चा का विषय रहा। फैसले के ऐलान के वक्त अपर सत्र न्यायाधीश तृतीय के न्यायालय के बाहर काफी गहमागहमी रही। दोनों पक्षों के अलावा दूसरे वकील भी इस फैसले को सुनने के लिए वहां जमा हुए।
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