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Hardoi News: एक यूनिट ब्लड से मिल रहा प्लाज्मा, प्लेटलेट्स व पीआरबीसी

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हरदोई। मेडिकल काॅलेज से संबद्ध जिला अस्पताल के ब्लड बैंक से अब संक्रामक रोगियों सहित डेंगू, मलेरिया व झुलसे मरीजों का भी इलाज संभव हो पा रहा है। ब्लड बैंक में कंपोनेट सेपरेटर यूनिट शुरू हो जाने से एक यूनिट ब्लड से चार प्रकार के मरीजों को ब्लड के अलग-अलग कंपोनेंट मिल पा रहे हैं। इससे मरीजों व तीमारदारों को जरूरत पड़ने पर अब गैर जनपद में दौड़ नहीं लगानी पड़ रही है।
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जिला अस्पताल के ब्लड बैंक से अभी तक मरीजों व तीमारदारों को सिर्फ होल ब्लड ही उपलब्ध हो रहा था। मरीजों को प्लेटलेट्स, पीआरबीसी व प्लाज्मा की जरूरत पड़ने पर भटकना पड़ता था, लेकिन अब ब्लड बैंक में कंपोनेंट यूनिट शुरू हो गई है, जिसमें जरूरत के हिसाब से प्रति यूनिट होल ब्लड 350 एमएल मशीन में डाला जाता है। इसके बाद पीआरबीसी, प्लाज्मा और प्लेटलेट्स अलग-अलग कैटेगरी में बंटकर निकल आता है। ब्लड बैंक के टेक्नीशियन अकील खान ने बताया कि कंपोनेंट सेपरेशन यूनिट के संचालित होने से रेफर की समस्या खत्म हो गई है।

ब्लड में चार कंपोनेंट मिलते हैं। इनमें पीआरबीसी (रेड ब्लड सेल), प्लाज्मा, प्लेटलेट़स और क्रायोप्रेसीपिटेट शामिल हैं। सेपरेशन यूनिट में ब्लड घुमाया जाता है। इससे ब्लड परत दर परत हो जाता है और आरबीसी, प्लाज्मा, प्लेटलेट्स और क्रायोप्रेसीपिटेट अलग-अलग हो जाते हैं। जरूरत के मुताबिक इन्हें निकाल लिया जाता है। वैसे तो प्रत्येक तत्व की अलग-अलग जीवन अवधि होती है। ऐसे में जरूरत पड़ने पर ही सेपरेशन किया जाता है।
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लैब टेक्नीशियन सर्वेंद्र सिंह ने बताया कि ब्लड के अलग-अलग कंपोनेंट की कई गंभीर बीमारी में जरूरत पड़ती है। खून में आरबीसी (लाल रक्त कणिकाएं) होती हैं, जो थैलेसीमिया के मरीजों को चढ़ाते हैं। प्लेटलेट्स डेंगू, मलेरिया या बुखार ग्रस्त रोगी को चढ़ाई जाती है। प्लाज्मा झुलसे हुए रोगियों को दिया जाता है और खून में डब्लूबीसी (श्वेत रक्त कणिकाएं) संक्रामक रोगियों को चढ़ाया जाता हैै।


हीमोफीलिया एक दुर्लभ, आनुवंशिक रक्त विकार है, जिसमें रक्त जमता नहीं है और रक्तस्राव को धीमा या बंद कर देता है। हीमोफीलिया तब होता है जब लोगों में सामान्य मात्रा में थक्के बनाने वाले कारक नहीं होते हैं। क्रायोप्रेसीपिटेट मिलने से हीमोफीलिया रोग का इलाज हो जाता है।


ब्लड के कंपोनेंट सेपरेशन यूनिट से कई मरीजों को लाभ मिलता है। पीआरबीसी के लिए 40 से 50 मरीज आते हैं। प्लेटलेट्स के लिए 20 से 25 और प्लाज्मा के लिए चार से पांच मरीज प्रतिदिन आते हैं। हालांकि, हीमोफीलिया दुर्लभ बीमारी है ऐसे में क्रायोप्रेसीपिटेट कंपोनेंट आवश्यकता अनुसार उपलब्ध कराया जाता है।
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