हरदोई। शहर से सटे इलाके महोलिया शिवपार निवासी शिक्षक अवधेश पांडेय के पुत्र मेजर पांडेय चीनी सीमा पर देश सेवा में पिछले वर्ष शहीद हो गए थे। उनकी शहादत पर पूरा जिला रोया जरूर, लेकिन उनकी वीरता पर सभी को गर्व है।
शहीद मेजर पंकज पांडेय का जन्म 23 सितंबर 1987 को हुआ था। सरस्वती विद्या मंदिर से अपने अध्यापक पिता के मार्गदर्शन में शुरुआती शिक्षा ग्रहण करने के बाद 10वीं और 12वीं की पढ़ाई राजकीय इंटर कॉलेज हरदोई से पूरी की।
पढ़ाई के साथ वह खेल कूद में भाग लेते थे। लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातक करते हुए राज्य स्तर के क्रिकेट खिलाड़ी के रूप में भी वह प्रसिद्ध हुए। 2007-2008 में सेंट्रल डिफेेंस सर्विसेज के लिए सेलेक्ट हुए पंकज पांडेय की पहली पोस्टिंग कश्मीर में हुई।
कमांडो की ट्रेनिंग प्राप्त करने के पश्चात कश्मीर में स्पेशल ऑपरेशन में प्रमुख भूमिका में रहे। कश्मीर के ही कुपवाड़ा में इनके नेतृत्व में एक आतंकवादी को मार गिराया गया था। इसलिए इन्हें वीरता पुरस्कार के लिए नामित किया गया और समय से पूर्व ही मेजर के रूप में पदोन्नत किया गया।
वर्ष 2020 से ही वह चीन सीमा पर तैनात थे। इस दौरान चीन सीमा के अंतिम बिंदु अरुणाचल प्रदेश में 15000 फीट की ऊंचाई पर पोस्ट कमांडर के रूप में एक नयी पोस्ट तपोला तैयार की गई। जिस पर सात माह पूर्व तक चीन का कब्जा था।
तपोला पोस्ट को उन्होंने जनवरी 2021 से अपने अंतिम पलों तक नहीं छोड़ा और भारत का ध्वज प्रतिदिन सवेरे सात बजे शान से साथ फहराया।
अत्यधिक ऊंचाई पर अपने कर्तव्य का पालन एवं नेतृत्व का उच्चतम स्तर प्रदर्शित करते हुए चीनियों को पीछे खदेड़ने के लिए चलाए जा रहे ऑपरेशन के दौरान अपने साथी जवान के प्राणों की रक्षा के लिए स्वयं को बलिदान कर दिया।
22 जुलाई 2021 को मेजर पंकज शौर्य का परिचय देते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। उनकी शहादत पर पूरे जिले को गर्व है।
1971 के युद्ध में शहीद मोहम्मद दीन का गांव आज भी उपेक्षित
हरपालपुर। 1971 में भारत-पाक युद्ध में दुश्मनों के छक्के छुड़ाते हुए शहीद हुए वीर मोहम्मद दीन का गांव मलौथा की आज तक जनप्रतिनिधियों व प्रशासन ने सुध नहीं ली है। गांव में उनके घर के सामने आज भी टूटा फूटा खड़ंजा बिछा है, न तो शहीद की याद में मुख्य द्वार बना और न उनकी प्रतिमा लगी है।
कटियारी क्षेत्र की सरजमीं पर जन्म लेकर देश प्रेम का जज्बा रखने वाले वीर सैनिक की कुर्बानी पर सभी को गर्व है। इस वीर रणबांकुरे ने अपने लहू का एक-एक कतरा भारत माता के लिए समर्पित करते हुए दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिए थे।
मलौथा गांव निवासी अलाउद्दीन के पुत्र मोहम्मद दीन 1963 में सेना की आठवीं बटालियन की आर्ट गॉड कोर में भर्ती हुई थी। सन 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध में शहीद हुए इस सैनिक ने भारतीय सेना में आठ साल चार माह तक का सफर तय किया और हमेशा हमेशा के लिए भारत मां की गोद में समा गए।
मलौथा गांव में परिवार के साथ रह रहीं 70 वर्षीय शहीद की विधवा रेशमा बेगम का 2018 में 70 वर्ष की अवस्था में लखनऊ में इलाज के दौरान इंतकाल हो गया।
लोग बताते हैं कि शहीद मोहम्मद दीन 1971 में जब एक महीने की छुट्टी पर आए थे। तो 10 दिन ही बीत पाने के बाद उनके अधिकारियों का टेलीग्राम आ गया और उन्हें वापस जाना पड़ा था।
भारत पाकिस्तान युद्ध में वह 24 नवंबर 1971 को दुश्मन से लोहा लेते हुए वह शहीद हो गए थे। इसके बाद शहीद के परिजनों की ओर से लगातार प्रशासन से मांग की जा रही थी कि गांव के बाहर उनकी प्रतिमा एवं मुख्य द्वार का निर्माण करा दिया जाए। सरकारी सिस्टम की उदासीनता के चलते न तो प्रतिमा लग पायी और न मुख्य द्वार का निर्माण हो सका।
फोटो-01- शहीद गनमैन मोहम्मद दीन- फोटो : HARDOI