संवाद न्यूज एजेंसी
हरदोई। आज सावन का प्रदोष व सोमवार है, इसलिए शिवभक्तों के लिए खास महत्व है। बेनीगंज देहात में स्थित श्री शिव महादेव प्राचीन मंदिर में गंगाजल से अभिषेक और शमी पत्र के श्रृंगार से मनोकामना पूरी होती है। मान्यता है कि यहां पर शमी पत्र से श्रृंगार करने पर भगवान भोलेनाथ जल्दी प्रसन्न होते है और अपने भक्त के संकटों को हर लेते हैं।
अधिकमास के सावन के सोमवार को शिवालयों में भक्तों की बड़ी भीड़ रहती है। बेनीगंज देहात के श्री शिव मंदिर महादेवपुरवा में स्थापित श्री शिवलिंग प्राचीन है। वैसे तो पौराणिक और आध्यात्मिक तौर पर कोई प्रमाण नहीं हैं लेकिन, यहां के बुजुर्ग बताते हैं कि यहां का शिवलिंग करीब एक हजार वर्ष पुराना है। शिवमंदिर परिसर में इस बात की गवाही के लिए एक बरगद का विशालकाय वृक्ष खड़ा हुआ है।
वैसे तो शिवलिंग पर बेलपत्र, दूध, दही, शहद, घी और नैवेद्य के साथ गंगाजल व अन्य पूजन सामग्री को चढ़ाया जाता है। मान्यता है कि यहां के शिवलिंग का गंगाजल से अभिषेक और शमीपत्र से श्रृंगार करने से मनोकामना जल्दी ही पूरी होती है। यहां पर शिवलिंग प्राचीन होने के साथ ही साथ भूतल पर ही स्थापित है और भगवान के शिव के वाहन नंदी दक्षिण मुख किए विराजमान हैं।
मंदिर में चारों दिशाओं में वेद स्थापित हैं। पूरब में ऋगवेद, पश्चिम में सामवेद, दक्षिण में यजुर्वेद व उत्तर दिशा में अथर्वेद स्थापित हैं। वेदों को मुगल शासन काल में उनके सैनिकों ने तोड़ने का प्रयास किया था। इससे निशान अभी भी मंदिर में बने हुए हैं। मंदिर परिसर में यज्ञशाला भी बनी हुई है।
प्रधान पुजारी ने बताया कि हजारों वर्ष पहले अंगिरा अक्षयपाद गौतम, अगस्त्य, अग्निवेश व अजातशत्रु अत्रि, कश्यप आदि ऋषि-मुनियों ने तपस्या की थी और यज्ञ करते थे। यहीं पर एक प्राचीन कुआं भी है। पुजारी ने बताया कि इस कूप में किसी ने महिषासुर मर्दनी की मूर्ति को डाल दिया था। मूर्ति के डालते ही कूप का पानी सूख गया था।
मां की मूर्ति निकालने के बाद कूप में पानी भर गया था। इसी कूप से भगवान श्रीहनुमान व भगवान श्रीशनि की मूर्ति भी प्राप्त हुई थी। तब लोगों ने यहां पर मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। बताया कि यहां आने वाले भक्त इस कूप का जल अपने घर अवश्य ले जाते हैं।
84 कोसी परिक्रमा के तीन पड़ाव से सात किमी. की है दूरी
पुजारी आचार्य विनय कुमार तिवारी ने बताया कि सावन माह में यहां पर बड़ी संख्या में सांप निकलते हैं लेकिन, वह किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। कई बार तो सांप लोगों के ऊपर से निकल जाते हैं। बताया कि 84 कोसी परिक्रमा के पड़ाव नगवा कोथावां, उमरानी व साखिन गोपालपुर और तीर्थराज नैमिषारण्य से मंदिर की दूरी सात किमी. है।
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फोटो - 17 हरपालपुर के सतौथा के बंकेश्वर नाथ महादेव। संवाद
फोटो - 18 पुजारी मुकेशानंद गिरि महाराज। संवाद
सावन की शिवतेरस को लगता है यहां मेला
हरपालपुर। कटियारी क्षेत्र के सतौथा गांव में स्थित आस्था के प्रतीक बाबा बंकेश्वर नाथ मंदिर का इतिहास पुराना है। गांव से कुछ दूरी पर बबूल के घने जंगल में स्वतः ही शिवलिंग का उदय हुआ था। ग्रामीणों ने जब खुदाई की तो उसमें शिवलिंग को देख सभी के होश उड़ गए। लोगों ने शिवलिंग को खोदने का प्रयास किया था और इसके इससे निशान आज भी बने हुए हैं।
सतौथा गांव निवासी सुरजन लाल पांडेय ने साल 1972 में मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। तत्कालीन पुजारी बाबा भगवानदास ने सुंदरीकरण कराया था। मान्यता है कि मंदिर पर आने वाले सभी शिवभक्तों की मनोकामना पूरी होती है। सावन की शिवतेरस पर भव्य मेला लगता है। कांवड़ियों का जत्था बाबा के दर्शन व जलाभिषेक के लिए आता रहता है। मंदिर के पुजारी मुकेशानंद गिरि महाराज ने बताया कि सावन और फागुन माह की शिवतेरस मेला लगता है।