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कोरोना के बाद अवसाद के बढ़े मरीज, आत्महत्या के उठा रहे कदम

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कोरोना के बाद अवसाद के बढ़े मरीज, आत्महत्या का उठा रहे कदम
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विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस पर विशेष -
हापुड़। कोरोना वायरस के संक्रमण की वजह से मानसिक अवसाद के मामले तेजी से बढ़े हैं। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार अवसाद के मरीजों की संख्या ढाई गुना तक बढ़ी है, ऐसे मरीजों की विभाग काउंसलिंग भी करा रहा है। हालांकि अवसाद से हारकर कई लोग आत्महत्या का रास्ता चुन रहे हैं। इसमें 15 से 30 आयु वर्ग के युवा अधिक हैं।
मनोचिकित्सक व सीएचसी अधीक्षक डॉ. दिनेश खत्री का कहना है कि आत्महत्या के मामलों में मानसिक अवसाद सबसे बड़ा कारण है। इसके साथ मेनिया, स्कीजोफ्रोनिया, ओसीडी जैसी मानसिक समस्याओं के कारण पीड़ित की हालत अधिक खराब हो जाती है।
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इसमें पीड़ित को लगता है कि उसके जीने का कोई मकसद नहीं है और वह आत्महत्या का रास्ता चुन लेता है। विभिन्न तरह से नशे के आदी हो चुके लोग भी आत्महत्या के लिए प्रेरित हो रहे हैं। एक समय आकर पीड़ित आर्थिक रूप से कमजोर पड़ जाता है, जिसमें शारीरिक और मानसिक समस्याओं के साथ उसमें अपनों से हीन भावना बढ़ती है और आखिर में वह आत्महत्या की दिशा में चला जाता है।
बच्चों और किशोरों में प्यार में असफल होना, रिश्ते का टूटना, परीक्षा में असफल होना, वीडियो और मोबाइल गेम्स से प्रेरित होकर आत्महत्या के लिए सोचना। इस वर्ग में दिमागी क्षमता इतनी विकसित नहीं होती है कि सामने क्या गलत है क्या सही, जिससे वे अवसाद में चले जाते हैं।
स्वास्थ्य विभाग चिकित्सक को दो रहा प्रशिक्षण
कोरोना के बाद से अवसाद के मरीज बढ़े हैं, जिसके चलते स्वास्थ्य विभाग के हर चिकित्सक को मनोविज्ञान का प्रशिक्षण कराया जा रहा है। ओपीडी में एमबीबीएस, फिजिशियन समेत अन्य चिकित्सक भी मनोरोगियों की काउंसलिंग कर रहे हैं।
अवसाद के लक्षण
खाना पीना बंद करना, नींद उड़ जाना, ना उम्मीद होना, अपने भविष्य के बारे में नकारात्मक सोच, किसी से कोई मदद की उम्मीद न करना, सभी चीजों में नकारात्मक देखना, शारीरिक रूप से कमजोर पड़ना, दोस्तों से संवाद खत्म, उदासी बढ़ना, अपनों के साथ आत्महत्या की बातें करना आदि शामिल है।
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इस तरह करें बचाव
अवसाद से पीड़ित मरीज अपनों के साथ आत्महत्या या मरने की बात कर रहा है तो उसे गंभीरता से लें। यह घरवालों के लिए चेतावनी के संकेत होते हैं। डिप्रेशन के लक्षण मिलने पर तुरंत डाक्टर या मनोचिकित्सक की सलाह लें। पीड़ित की काउंसलिंग करें, उसके साथ पारिवारिक समर्थन बढ़ाएं । - डॉ. विकास सैनी, मनोचिकित्सक।
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