हापुड़ : विभिन्न आदेशों के बाद भी ईंधन के रूप में लकड़ी, कोयले और डीजल का इस्तेमाल करने कर संचालित की जा रही फैक्टरियों पर कार्रवाई शुरू हो गई है। प्रदूषण विभाग की टीम ने इन फैक्टरीयों में औचक निरीक्षण कर 28 जनरेटरों के कनेक्शन कटवा दिए हैं। साथ ही इन जनरेटरों को सील भी कर दिया गया है। जिले की हवा को प्रदूषित होने से बचाने के लिए विभाग यह कार्रवाई कर रहा है।
उच्चतम न्यायालय के संरक्षण में गठित एयर क्वालिटी मैनेजमेंट कमीशन ने कोयला, लकड़ी आदि को ईंधन के रूप में इस्तेमाल करने पर रोक लगाने के आदेश दिए थे। इसके बाद जिले में उद्यमियों को भी अगस्त 2023 तक का समय दिया गया था कि वह इन ईंधन का प्रयोग उद्योगाें के संचालन के लिए न करें। जनपद में पीएनजी पाइप लाइन ना होने के कारण उद्यमियों ने समय बढ़ाने की मांग की थी। पाइप लाइन डालने वाली कंपनी आइजीएल के अधिकारियों ने बताया कि अप्रैल माह में एमजी रोड, टैक्सटाइल सेंटर आदि में काम लगभग पूरा हो चुका है। इन क्षेत्रों में अब तक 14 उद्योगों को कनेक्शन भी दिए जा चुके हैं, लेकिन उद्यमी अभी भी कनेक्शन लेने को लेकर उदासीनता बरत रहे हैं। इसके बाद प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की टीम ने कार्रवाई की है। एमजी रोड, धौलाना के खेड़ा क्षेत्र और हापुड़ नगर में जांच के बाद जनरेटरों के कनेक्शन काटने के साथ ही सीलिंग कर दी है। इस बार सर्दियों में जिलेवासियों को प्रदूषण की समस्या न झेलनी पड़ें, इसलिए अभी से सख्त कदम उठाए जा रहे हैं।
जिले में 300 से अधिक औद्योगिक इकाइयां -
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार, जिले के तीनों औद्योगिक क्षेत्रों में मिलाकर तीन सौ से अधिक औद्योगिक इकाइयां हैं, जो ईंधन के रूप में लकड़ी, कोयले व डीजल का इस्तेमाल कर रही थीं। इसमें मसूरी-गुलावठी रोड औद्योगिक क्षेत्र की स्थापना वर्ष 2000 में की गई थी। वर्तमान में औद्योगिक क्षेत्र में लगभग 1270 इकाइयां संचालित हैं। लकड़ी समेत अन्य ईंधन का इस्तेमाल कपड़े की रंगाई वाली और स्टील बनाने वाली फैक्टरियों भी करती हैं। इसके अतिरिक्त हापुड़-पिलखुवा विकास प्राधिकरण की तरफ से पिलखुवा में दो औद्योगिक क्षेत्र विकसित किए गए हैं। इनमें एक पिलखुवा टैक्सटाइल सेंटर और दूसरा खेड़ा औद्योगिक क्षेत्र है।
बायलर फैक्टरियों से होता है सबसे अधिक प्रदूषण
कपड़े की रंगाई, प्लाईवुड में भाप बनाने के लिए, मेटल रीसाइक्लिंग करने वाली फैक्टरियों में धातु को प्लास्टिक आदि से अलग करने के लिए आग का इस्तेमाल किया जाता है। क्योंकि इस प्रकार की ज्यादातर फैक्टरियां सूक्ष्म व मध्यम श्रेणी की होती हैं और ऊर्जा के लिए लकड़ी या कोयले का इस्तेमाल करती हैं। विकल्प के रूप में बिजली का भी इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन बिजली महंगी होने के चलते उद्यमी अधिकतर कोयले और लकड़ी को ही लाभप्रद मानते हैं, लेकिन यह पर्यावरण काे नुकसान पहुंचाते हैं।
यह कहते हैं अधिकारी
कोयला, लकड़ी और डीजल ईंधन का इस्तेमाल कर फैक्टरियों का संचालन नहीं किया जा सकता है। इससे प्रदूषण फैलता है। पीएनजी के अलावा बायोमास और एलएचएफ का इस्तेमाल भी कर सकते हैं। ड्यूल फ्यूल किट न लगाने पर 28 जनरेटरों के कनेक्शन काटने के साथ ही सील किए गए हैं। - विपुल, सहायक अभियंता, उत्तर प्रदेश राज्य प्रदूषण नियंत्रण
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