जलबिहार मंच पर श्रीराम कथा के पांचवें दिन महाकाल की
नगरी उज्जैन से पधारी बाल संत प्रभु प्रिया ने कहा जब जब इस धरती पर पाप
बढ़ा है तब गौ ब्राह्मण एवं संतों पर अत्याचार हुए हैं तब भगवान ने जन्म
लेकर अत्याचारियों का वध कर इस धरती को उनसे मुक्त कराया।
कथावाचिका ने
कहा कि नारद ने भगवान विष्णु से विवाह की चर्चा की। तब भगवान ने उन्हें
विवाह करने से मना कर दिया। नारायण ने नारद से कहा कि जो भी व्यक्ति मेरी
शरण में आ जाता है मैं उसका हित ही नहीं परम हित करता हूं।
भगवान विष्णु
इतना कहकर नारद को वानर रूप प्रदान कर अंतर्ध्यान हो गए। विश्वमोहिनी की
सभा में वरण के दौरान नारद को देख विश्वमोहिनी आगे बढ़ीं तो नारद ने सोचा
शायद विश्व मोहिनी ने मुझे देखा नहीं है इसलिए वह पुन: दूसरी लाइन में बैठ
गए।
सभागार में मौजूद प्रभु के गले में विश्वमोहिनी ने वरमाला डाल दी। शीशे
में जब नारद ने अपना रूप देखा तो नारद ने भगवान शंकर के दो गणों को राक्षस
होने का शाप दे दिया।
भगवान विष्णु के मिलने पर उन्होंने भला बुरा कह शाप
देकर कहा कि वानर ही तुम्हारी मदद करेंगे। कथावाचिका ने कहा कि दूसरों को
देकर कभी भी उनका उपहास नहीं करना चाहिए। चाहे वह तुम्हारा दुश्मन ही क्यों
न हो।
कथा के दौरान समिति के अध्यक्ष केजी अग्रवाल, रमेश चन्द्र सोनी,
पंकज सोनी, नीरज अग्रवाल, मुन्नी लाल शुक्ल सहित सैकड़ों की तादाद में
महिलाओं ने कथा का रसपान किया।