पब्लिक स्कूलों के संचालकों ने शिक्षा सत्र शुरू होते ही अभिभावकों पर
मनमाना बोझ डाल फीस व पाठ्यक्रम का खेल शुरू कर दिया है। स्कूलों ने मनमानी
कर जहां प्रवेश शुल्क व मासिक शुल्क में पचास से साठ फीसदी वृद्धि कर दी
है वहीं निजी स्कूल संचालक ट्रांसपोर्टेशन व इन्वर्टर चार्ज के साथ रखरखाव
के रूप में ले रहे हैं। इसके अलावा कुछ स्कूल विकास अभिदान शुल्क वसूल रहे
हैं।
जिले में पब्लिक स्कूलों की बाढ़ सी आ गई है। इनमें कुछ सीबीएसई और
आईसीएसई से मान्यता प्राप्त कर हैं। अंग्रेजी माध्यम के नाम पर पब्लिक
स्कूलों की मनमानी जारी है। पब्लिक स्कूल संचालकों ने शुल्क में बढ़ोत्तरी
कर मनमानी शुरू कर दी है। डीजल के दाम घटने के बावजूद ट्रांसपोर्टेशन चार्ज
बढ़ा दिया है।
देखा जाए तो सभी विद्यालयों में एक ही पाठ्यक्रम के लिए
शासनादेश जारी हो चुका है। स्कूल संचालकों के पचास से साठ फीसदी फीस पर
बढ़ोत्तरी कर देने से अभिभावक परेशान हैं। शिक्षा सत्र के दौरान हर स्कूल
से लाखों रुपये की किताब कापियों की बिक्री की जाती है।
जिसका सेल्स टैक्स
बनता है, पर आज तक किसी भी सेल्स टैक्स अफसर ने इस ओर ध्यान नहीं दिया।
इससे प्रति वर्ष लाखों की कर चोरी हो रही है। स्कूल संचालक के साथ पुस्तक
विक्रेता विभाग को चूना लगा रहे हैं। इसके साथ स्कूल बसें तो चला रहे हैं
मगर ज्यादातर वाहन परिवहन विभाग में पंजीकृत नहीं कराए गए हैं। इससे विभाग
को राजस्व का चूना लग रहा है।
एमआरपी रेट पर दी जा रहीं किताबें
निजी
विद्यालय संचालक ड्रेस, बैच, टाई, बेल्ट और स्कूल वाहन का पैसा भी लेते
हैं। कमीशनबाजी के चलते वह अपना ही पाठ्यक्रम चला रहे हैं, जिस पर उन्हें
50 से 60 फीसदी प्रति सेट के हिसाब से संबंधित दुकानदार दे रहे हैं। इसमें
एमआरपी रेट पर किताबें दी जा रही हैं। इसके साथ ही मनमानी दर पर कापियों को
लेना अनिवार्य कर दिया गया है।
हाईस्कूल-इंटर की किताबों की नहीं हो रही बिक्री
हाईस्कूल
और इंटरमीडिएट का मूल्यांकन कार्य जारी रहने से कालेजों में सिर्फ जूनियर
स्तर तक के छात्रों का दाखिला हो पा रहा है। यही कारण है कि हाईस्कूल और
इंटर की किताबों की बिक्री बंद है। पुस्तक विक्रेता कहते है कि पाठ्य
पुस्तकों की बिक्री अभी कक्षा आठ तक की ही हो रही है। फिलहाल सेल्स टैक्स
से बचने के तरीके भी दुकानदार ढूंढ चुके हैं। पूछने पर दुकानदार जहां कक्षा
एक की कापी किताबों की कीमत 1200 से 1500 रुपये बता रहे हैं। वहीं अभिभावक
अपनी जेब से 2300 रुपये ढीले होने की बात कह रहे हैं।